संभाजी महाराज की जयंती हर साल 14 मई को मनाई जाती है। संभाजी महाराज मराठा सम्राट के महान शासक और वीर योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र थे।
संभाजी महाराज का जीवन परिचय
संभाजी महाराज का जन्म साल 1657 में 14 मई को हुआ था। शिवाजी की पहली पत्नी साईबाई से संभाजी का जन्म हुआ था। जन्म के 2 वर्ष बाद ही संभाजी महाराज की माता का निधन हो गया था।
जिसके बाद उनका पालन पोषण शिवाजी की मां यानी संभाजी की दादी जीजाबाई ने किया था। संभाजी संस्कृत के ज्ञाता वीर योद्धा एवं कला प्रेमी भी थे।
संभाजी महाराज ने मात्र 14 साल की उम्र में तीन ग्रंथ लिखे बुद्धभुषण, सातशातक, नायिकाभेद। यह तीनों ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए थे।
साल 1674 में 6 जून को शिवाजी महाराज के राज्य अभिषेक के समय संभाजी को मराठा साम्राज्य का राजकुमार घोषित किया गया।
जिसके बाद एक राजकुमार के रूप में संभाजी ने अपनी बहादुरी दिखाई। संभाजी ने मात्र 16 साल की उम्र में रामनगर में अपना पहला युद्ध जीता। संभाजी महाराज को बचपन में छवा कहकर भी पुकारा जाता था जिसका अर्थ था शेर का बच्चा।
संभाजी के पिताजी से कड़वे संबंध
संभाजी का बचपन कई परेशानियों में गुजरा। संभाजी जब 2 वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनकी सौतेली माता सोयराबाई की मंशा अपने पुत्र राजाराम को मराठा साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की थी।
जिसके कारण सोयराबाई की वजह से संभाजी और शिवाजी के बीच संबंध खराब होने लगे थे। जबकि संभाजी ने कई बार अपनी बहादुरी साबित करने की कोशिश की लेकिन शिवाजी को कभी उन पर विश्वास नहीं हुआ।
ऐसे में शिवाजी ने एक बार संभाजी को सजा भी दी।लेकिन इस सजा को स्वीकार ना करके संभाजी वहां से भाग निकले और मुगलों के साथ जाकर मिल गए।
इसके कुछ समय बाद संभाजी ने मुगलों को हिंदूओं पर अत्याचार करते हुए देखा तब संभाजी को अपनी गलती का एहसास हुआ और इसके बाद संभाजी शिवाजी से अपनी गलती की माफी मानने चले गए ।
संभाजी महाराज की उपलब्धियां
संभाजी महाराज ने अपने जीवन में छोटी सी उम्र में ही हिंदू समाज के हित में कई बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल की। संभाजी महाराज ने केवल 8 साल की उम्र में औरंगजेब की 8 लाख की सेना का सामना किया और कई मुगलों को हराया।
संभाजी महाराज की मृत्यु
संभाजी के मुस्लिम धर्म को ना को बोलने से औरंगजेब बहुत गुस्सा था। जिसके बाद औरंगजेब ने संभाजी के जख्मों पर नमक लगाने का हुक्म दे दिया। संभाजी को घसीट कर औरंगजेब ने अपने सिंहासन तक लाने को कहा।
जब संभाजी को औरंगजेब के सिंहासन तक लेकर जाया जा रहा था, तब संभाजी अपने भगवान को याद कर रहे थे। इसलिए औरंगजेब ने उनकी जीभ काटने का आदेश दे दिया। जिसके बाद संभाजी की जीप काट दी गई और कुत्तों को खिला दी गई।
इतना अत्याचार सहने के बावजूद भी संभाजी मुस्कुराते रहें और औरंगजेब को देखते रहे। जिसके बाद संभाजी की आंखें निकाल दी गई और उनके हाथ भी काट दिए गए।
इतना सब कुछ सहने के बावजूद भी संभाजी अपने माता-पिता को याद कर रहे थे। हाथ कटने के 2 सप्ताह बाद साल 1689 में 11 मार्च को संभाजी का सर काट दिया गया।
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