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Gangaur festival : भीलवाड़ा जिले में गणगौर पर्व इस बार भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया. शहर से गांव तक महिलाओं और युवतियों ने सोलह श्रृंगार कर सामूहिक पूजा की. ईसर-गणगौर की विधि-विधान से आराधना हुई और माहौल भक्ति व उल्लास से सराबोर नजर आया, जिससे परंपरा और संस्कृति की झलक साफ दिखी.
भीलवाड़ा : भीलवाड़ा जिले में महिलाओं के प्रमुख और पारंपरिक त्योहारों में शामिल गणगौर इस बार भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया. शहर से लेकर गांवों तक इस पर्व की रौनक साफ देखने को मिली. इसके तहत भीलवाड़ा शहर के शास्त्री नगर क्षेत्र में महिलाओं और कुंवारी कन्याओं ने सामूहिक रूप से गणगौर का पूजन किया. सुबह से ही महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी सोलह सिंगार में नजर आईं और घरों व मंदिरों में पूजा-अर्चना की तैयारियों में जुट गईं. पूजा स्थल को सुंदर तरीके से सजाया गया और ईसर-गणगौर की प्रतिमाओं को स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की गई, जिससे पूरे माहौल में भक्ति और उल्लास का रंग घुल गया.
गौरतलब है कि गणगौर का त्योहार होली के बाद शुरू होकर करीब 16 दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन विशेष पूजा और रीति-रिवाज निभाए जाते हैं. अंतिम दिन गणगौर की विदाई बड़े ही भावुक माहौल में की जाती है. इस दौरान महिलाएं गीत गाते हुए गणगौर को विदा करती हैं और अगले वर्ष पुनः आने की कामना करती हैं. इस तरह गणगौर का त्योहार महिलाओं के जीवन में खुशी, आस्था और सांस्कृतिक जुड़ाव का अनमोल संगम बनकर सामने आता है.
गणगौर व्रत: प्रेम और समर्पण का प्रतीक
नव विवाहिता किरण शर्मा ने बताया कि गणगौर पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत खास माना जाता है. यह त्योहार भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, जिन्हें इस दिन ईसर और गणगौर के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था, उसी तप और समर्पण की याद में यह पर्व मनाया जाता है. इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और अटूट प्रेम के लिए व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं अच्छे और योग्य वर की प्राप्ति की कामना करती हैं. यही कारण है कि यह पर्व महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व रखता है.
सोलह श्रृंगार संग महिलाओं ने की गणगौर पूजा
इस मौके पर महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर विशेष रूप से पूजा में भाग लिया. पूजा के दौरान ईसर-गणगौर को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया गया, जिसमें खासतौर पर शक्करपारे और मिठाइयां शामिल थीं. यह पर्व उनके लिए बेहद खास है, क्योंकि इसमें भगवान शिव को ईसर और माता पार्वती को गणगौर के रूप में पूजते हैं. उन्होंने कहा कि इस व्रत से दांपत्य जीवन में प्रेम और विश्वास मजबूत होता है.
सुहागिनों का आस्था पर्व: सुख-समृद्धि की कामना
विवाहिता गीता सोनी ने बताया कि गणगौर का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सदा सुहागन रहने और परिवार में सुख-समृद्धि बनाए रखने की कामना से किया जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि इस दिन महिलाएं पूरे विधि-विधान से पूजा करती हैं और दिनभर व्रत रखती हैं. पूजा के साथ-साथ महिलाओं ने गणगौर और ईसर भगवान से जुड़ी कथाएं सुनीं और सामूहिक रूप से पारंपरिक लोकगीत गाए.
पार्वती के तप से जुड़ी गणगौर की पौराणिक कथा
गणगौर क्यों मनाया जाता है इसे लेकर भी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसी कथा के आधार पर यह पर्व प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख का प्रतीक बन गया. यह त्योहार नारी शक्ति, सौभाग्य और समृद्धि का भी प्रतीक माना जाता है. इसलिए महिलाएं पूरे मन से इस व्रत को करती हैं और अपने परिवार के सुख-शांति और खुशहाली की कामना करती हैं.
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