आस्था और संस्कृति का संगम, यहां हुई बाघ देवता की स्थापना, वन्यजीव संरक्षण की नई मिसाल

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झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व से एक अनोखी पहल सामने आई. सरहुल के पावन अवसर पर यहां बाघ को प्रकृति के रक्षक के रूप में स्थापित करते हुए “बाघ देवता” की स्थापना की गई. शनिवार के दिन पूरा देश प्रकृति के महापर्व सरहुल की खुशियों में डूबा दिखा. वहीं पलामू टाइगर रिजर्व के उत्तरी क्षेत्र अंतर्गत छिपादोहर के लात गांव में अनोखी पूजा देखी गई. 

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झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व से एक अनोखी पहल सामने आई. सरहुल के पावन अवसर पर यहां बाघ को प्रकृति के रक्षक के रूप में स्थापित करते हुए बाघ देवता की स्थापना की गई. शनिवार के दिन पूरा देश प्रकृति के महापर्व सरहुल की खुशियों में डूबा दिखा. वहीं पलामू टाइगर रिजर्व के उत्तरी क्षेत्र अंतर्गत छिपादोहर के लात गांव में अनोखी पूजा देखी गई. जहां 15 से अधिक गांवों के ग्रामीण एकत्रित हुए और पारंपरिक विधि-विधान के साथ बाघ देवता की पूजा-अर्चना की. प्रकृति और वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर की गई. इस पहल को ग्रामीणों ने आस्था और जागरूकता से जोड़ते हुए एक नई परंपरा की शुरुआत बताया.

सरहुल पर्व प्रकृति, पेड़-पौधों और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है. इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ग्रामीणों ने बाघ को जंगल का रक्षक मानकर उसे देवता के रूप में स्थापित किया. कार्यक्रम में सैकड़ों ग्रामीणों ने भाग लिया और पारंपरिक गीत-संगीत के बीच पूजा संपन्न हुई. पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर प्रजेशकांत जेना ने कहा कि बाघ देवता की स्थापना से जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति लोगों की आस्था मजबूत होगी. बाघ देवता अब इस क्षेत्र में प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के प्रतीक के रूप में उभरेंगे, जिससे ग्रामीणों और जंगल के बीच संबंध और गहरा होगा.

बाघ देवता की स्थापना
जिस इलाके में बाघ देवता की स्थापना की गई है, वह क्षेत्र लंबे समय से बाघ के मूवमेंट के लिए जाना जाता रहा है. पलामू टाइगर रिजर्व प्रशासन द्वारा लगातार जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं. इसी क्रम में स्थानीय संस्कृति को संरक्षण से जोड़ने की यह पहल की गई है. बताया जा रहा है कि कुछ दिनों पहले ग्रामीणों ने आपसी सहमति से बाघ देवता की स्थापना का निर्णय लिया था, ताकि आने वाली पीढ़ियों में भी जंगल और वन्यजीवों के प्रति सम्मान की भावना बनी रहे. यह पहल इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि झारखंड में पहली बार किसी क्षेत्र में बाघ को देवता के रूप में स्थापित कर पूजा की शुरुआत की गई है. करीब 1152 वर्ग किलोमीटर में फैला पलामू टाइगर रिजर्व देश के पुराने टाइगर रिजर्व में शामिल है, जहां बाघ संरक्षण की दिशा में लंबे समय से प्रयास किए जा रहे हैं. ऐसे में सरहुल पर्व पर बाघ देवता की स्थापना को प्रकृति, परंपरा और संरक्षण के संगम के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में वन्यजीव संरक्षण के लिए एक नई मिसाल बन सकती है.



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