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गांवों में जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो उपचार के लिए अक्सर कुछ पारंपरिक तरीके अपनाए जाते हैं. इन्हीं में से एक है अड़हुल (गुड़हल) के फूल से धड़कोना देना. इस प्रक्रिया में अड़हुल के फूल या उसकी डाली को मरीज के ऊपर घुमाया जाता है या हल्के से स्पर्श कराया जाता है. माना जाता है कि इससे बीमारी दूर होती है या बुरी नजर का असर खत्म हो जाता है. यह एक पुरानी परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है.
गोंडा: गांवों में जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो उपचार के लिए अक्सर कुछ पारंपरिक तरीके अपनाए जाते हैं. इन्हीं में से एक है अड़हुल (गुड़हल) के फूल से धड़कोना देना. इस प्रक्रिया में अड़हुल के फूल या उसकी डाली को मरीज के ऊपर घुमाया जाता है या हल्के से स्पर्श कराया जाता है. माना जाता है कि इससे बीमारी दूर होती है या बुरी नजर का असर खत्म हो जाता है. यह एक पुरानी परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है. उनका मानना है कि कई बार बीमारी केवल शारीरिक नहीं बल्कि नजर या नकारात्मक ऊर्जा के कारण भी होती है. ऐसे में अड़हुल का फूल धड़कोना देने से मरीज को राहत मिलती है और उसकी तबीयत में सुधार आता है.
गांव वैद्य करते थे इलाज
लोकल 18 से बातचीत के दौरान वैद्य (डॉ) अभिषेक कुमार मिश्रा बताते हैं कि आयुर्वेद शास्त्रों में चरक, सुश्रुत और वाग्भट ने जो बातें बताई थी. उसे हिसाब से जो आज की स्थिति आप देख रहे हैं मॉडर्न हॉस्पिटल उपलब्ध है और कई टेक्नोलॉजी उपलब्ध है पहले ऐसा नहीं होता था. इस समय जब किसी की तबीयत खराब होती है तो हम उसे तुरंत अस्पताल पहुंचते हैं या एंबुलेंस के लिए हम कॉल करते हैं लेकिन ऐसी पहले कोई सुविधा नहीं थी. पहले जो गांव में वैद्य हुआ करते थे वह माली (फार्मासिस्ट) के साथ में मिलकर इलाज करते थे. यदि छोटी प्रॉब्लम है तो उसकी दवा और जड़ी बूटी देकर ठीक कर देते थे लेकिन प्रॉब्लम बड़ी होती थी और जो उस समय महान वैद्य हुआ करते थे वह घूम-घूम कर पूरे भारत में चिकित्सा देते रहते थे. संदेश देने के लिए अड़हुल के फूल का इस्तेमाल किया जाता था. अमूमन आप देखते हैं कि जब इसको डाला जाता है तो किसी चौराहे पर ही डाला जाता है. इसके पीछे का सबसे बड़ा रीजन यही है. फिर उसे रास्ते से यदि कोई महान वैद्याचार गुजरते थे तो वह देख लेते थे. इस गांव में कोई बड़ी संकट है और जाकर वह इलाज करते थे. पहले के समय में यह यह एक सूचना का काम करता था.
धड़कोना क्या होता है?
अभिषेक मिश्रा बताते हैं कि वायरस और बैक्टीरिया लाल कलर को देखकर इस पर अटैक करते हैं. इसलिए गांव में यदि किसी को चेचक होता है तो अभी भी एक बर्तन में पानी और अड़हुल का फूल डालकर उस व्यक्ति के सिर के ऊपर से सात बार घूम कर चौराहे पर धड़कोना दिया जाता है. इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि लाल कलर को देखकर वायरस उसी की तरफ अटैक करता है और ऐसा करने से धीरे-धीरे चेचक कम होने लगता है क्योंकि चेचक एक वायरस बीमारी है. चेचक में अड़हुल का फूल खाने के लिए भी कहा जाता है क्योंकि इसमें इम्यूनिटी पावर बूस्ट करने की क्षमता होती है. इसलिए आज भी गांव धड़कोना देने की परंपरा चलती आ रही है. यह एक साइंटिफिक रीजन भी है.
डॉ अभिषेक कुमार मिश्रा बताते हैं कि अगर वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो अड़हुल यानी गुड़हल का फूल आयुर्वेद में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. इसमें कई औषधीय गुण पाए जाते हैं, जैसे एंटीऑक्सीडेंट और एंटी बैक्टीरियल तत्व. यह शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाने, सूजन कम करने और तनाव घटाने में मदद कर सकता है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें




