भारत रक्षा तकनीक के सबसे मुश्किल क्षेत्र में चुपचाप लेकिन अहम कदम उठा रहा है. यह कदम है अपना खुद का जेट इंजन बनाने का. डीआरडीओ के अधीन काम करने वाले एक प्रमुख लैब गैस टरबाइन रिसर्च संस्थान (GTRE) ने घरेलू और विदेशी कंपनियों से नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स स्थापित करने के लिए वैश्विक और घरेलू कंपनियों से जानकारी मांगी है. सीएनएन-न्यूज18 को इस दस्तावेज की एक्सक्लूसिव कॉपी हाथ लगी है.
यह प्रस्तावित नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स एक बड़ी और एकीकृत सुविधा होगी, जहां पूरे इंजन के साथ-साथ उसके अलग-अलग हिस्सों जैसे फैन, कंप्रेसर, कंबस्टर, टर्बाइन और आफ्टरबर्नर को वास्तविक उड़ान की नकल वाली स्थितियों में टेस्ट किया जा सकेगा. इसमें ऐसे सिस्टम होंगे, जो ऊंचाई वाले वातावरण (हाई एल्टीट्यूड) को दोबारा बना सकें, साथ ही हाईटेक एयर हीटिंग और कूलिंग व्यवस्था भी होगी. आसान शब्दों में कहें तो इंजीनियर जमीन पर ही इंजन को ऐसे टेस्ट कर सकेंगे जैसे वह 40,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा हो.
मुट्ठी भर देश बनाते हैं अपना जेट इंजन
जेट इंजन दुनिया की सबसे जटिल तकनीकों में से एक है. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन जैसे केवल मुट्ठी भर देश ही इसे पूरी तरह महारत हासिल कर पाए हैं. यह सुविधा भारत को उस क्लब में शामिल होने की दिशा में एक कदम है.
जेट इंजन को बार-बार ऊंची उड़ान, तेज गर्मी, दबाव में बदलाव, लंबे समय तक चलने वाले टेस्टिंग जैसी बेहद कठिन स्थितियों में गुजरना पड़ता है. बिना विश्व स्तरीय टेस्टिंग सुविधा के सबसे अच्छे डिजाइन भी पूरी तरह साबित नहीं हो पाते.
तेजस की राह से हटेगा बड़ा रोड़ा
तेजस सहित भारत के ज्यादातर फ्रंटलाइन फाइटर एयरक्राफ्ट जनरल इलेक्ट्रिक जैसी विदेशी कंपनियों से ही इंजन लेते हैं. ये साझेदारियां जरूरी हैं, लेकिन इनमें सीमाएं भी हैं. बाहरी सप्लायर पर निर्भरता, अपग्रेड और टेक्नोलॉजी एक्सेस पर पाबंदियां इसकी राह में बड़ा रोड़ा है. सबसे खराब स्थिति में भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई में रुकावट सीधे सैन्य तैयारियों को प्रभावित कर सकती है.
5th जेन फाइटर जेट की उड़ा में बड़ी उछाल
डीआरडीओ का यह नया कदम का सिर्फ एक टेस्टिंग फैसिलिटी बनाने तक सीमित नहीं है. इसका मकसद धीरे-धीरे इस निर्भरता को कम करना है. आला अधिकारियों ने न्यूज18 को यह जानकारी देते हुए बताया कि इस तरह का कोई प्रोजेक्ट, स्वदेशी इंजन के विकास में तेजी ला सकता है, टेस्टिंग के चक्र को छोटा कर सकता है और भरोसेमंद प्रदर्शन को बेहतर बना सकती है. ये सभी बातें तब और भी ज्यादा जरूरी हो जाती हैं, जब भारत अपने भविष्य के 5th जेनेरेशन फाइटर जेट्स को अपने ही देश में बने इंजनों से लैस करना चाहता हो.
इसका एक व्यापक आर्थिक और तकनीकी पहलू भी है. दुनिया भर की कंपनियों को आमंत्रित करके, भारत सहयोग, विशेषज्ञता के आदान-प्रदान और संभवतः टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए दरवाजे खोल रहा है. इससे देश के भीतर एक मजबूत एयरोस्पेस इकोसिस्टम बनाने में मदद मिल सकती है, उच्च-कौशल वाली नौकरियाँ पैदा हो सकती हैं और भारत, एडवांस्ड प्रोपल्शन सिस्टम के क्षेत्र में एक गंभीर दावेदार के तौर पर अपनी जगह बना सकता है.
अधिकारियों का कहना है कि कई मायनों में, यह एक बुनियादी निवेश है. एक आला अधिकारी ने न्यूज18 को बताया, ‘अगर भारत उन चुनिंदा देशों की कतार में शामिल होना चाहता है, जो अपने खुद के जेट इंजन डिजाइन करते हैं, बनाते हैं और उनका रखरखाव करते हैं, तो उसे इस तरह की ‘पर्दे के पीछे’ वाली क्षमताओं को विकसित करने की जरूरत है.’




