जीवन हारेगा, हम केस जीतेंगे… हरीश राणा केस में कोर्ट का छलका दर्द, जज हुए भावुक, वकील ने बताई आंखों देखी

Date:


होमताजा खबरदेश

जीवन हारेगा, हम केस जीतेंगे… हरीश राणा केस में कोर्ट का छलका दर्द, जज भावुक

Last Updated:

Harish Rana Case: हरीश राणा केस में सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में चल रहे मरीज के उपचार हटाने की अनुमति दे दी है. जज और वकील मनीष जैन भी काफी भावुक हो गए. कोर्ट रूम का पूरा माहौल गमगीन हो गया था. उस वक्त के माहौल का खुद मनीष जैन ने आंखों देखा हाल सुनाया है.

Zoom

13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है.

Harish Rana Case: कभी-कभी अदालतों में सिर्फ कानून की भाषा नहीं बोलती, बल्कि इंसानी भावनाएं भी अपनी जगह बना लेती हैं. हरीश राणा केस की सुनवाई ऐसा ही एक दुर्लभ क्षण बनकर सामने आई, जहां फैसले के साथ-साथ संवेदनाएं भी स्पष्ट रूप से महसूस की गईं. करीब 13 साल से कोमा में चल रहे हरीश राणा के मामले में जब सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना रहा था, तो कोर्ट रूम का माहौल असामान्य रूप से गंभीर और भावुक हो गया. बताया जाता है कि लगभग 45 मिनट तक चले फैसले के दौरान आखिरी क्षणों में पूरा कक्ष सन्नाटे में डूब गया. इस दौरान जजों ने न केवल कानूनी पहलुओं पर विचार किया, बल्कि मरीज के माता-पिता से व्यक्तिगत रूप से बातचीत कर पूरे मामले को मानवीय दृष्टिकोण से भी समझने की कोशिश की. माहौल इतना भावुक हो गया कि जजों की आंखें भी नम हो उठीं.

इस केस की पैरवी कर रहे वकील मनीष जैन भी इस भावनात्मक क्षण से अछूते नहीं रहे. उन्होंने News18 इंडिया से बातचीत में कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें जीवन हारेगा… और हम केस जीतेंगे. उनके इस बयान ने पूरे मामले की संवेदनशीलता को एक ही वाक्य में सामने ला दिया. उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह इस केस के दौरान जजों ने असाधारण संवेदनशीलता दिखाई और फैसला सुनाते समय भावुक हो गए.

ऐसी थी पूरी कानूनी यात्रा

मनीष जैन ने केस की पूरी कानूनी यात्रा को भी सिलसिलेवार तरीके से साझा किया. हाईकोर्ट से शुरुआत, सुप्रीम कोर्ट में लंबी सुनवाई, मेडिकल बोर्ड का गठन और अंततः उपचार हटाने की अनुमति तक का सफर. उनके मुताबिक, यह सिर्फ एक केस नहीं था, बल्कि एक ऐसी मानवीय त्रासदी थी, जिसने कानून को भी संवेदनशील होने पर मजबूर कर दिया.

इस बीच, एम्स में हरीश राणा का इलाज जारी है और आज इस प्रक्रिया का नौवां दिन है. वकील मनीष जैन लगातार परिवार के संपर्क में हैं और स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. हालांकि, पूरे मामले को बेहद गोपनीय रखा गया है और मेडिकल अपडेट सीमित स्तर पर ही साझा किए जा रहे हैं. दरअसल, यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसे परिवार की 13 साल लंबी पीड़ा की कहानी भी है, जो लगातार उम्मीद और हकीकत के बीच झूलता रहा. जब मेडिकल साइंस ने भी हाथ खड़े कर दिए, तब यह सवाल सामने आया कि क्या ऐसी स्थिति में व्यक्ति को गरिमापूर्ण विदाई का अधिकार मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर उपचार हटाने की अनुमति दी, हालांकि इसे यूथनेशिया की संज्ञा देने से बचा गया.

फैसले के बाद जहां एक ओर इसे न्यायिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी साफ है कि यह जीत खुशी लेकर नहीं आई. हरीश राणा केस ने यह साबित कर दिया कि कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं, जहां फैसला भले ही पक्ष में हो, लेकिन दिल पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाता. यह एक ऐसी लड़ाई थी, जिसमें कानून की जीत के साथ-साथ जीवन की हार भी तय मानी जा रही है.

About the Author

authorimg

संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related