असली धुरंधर! 23 की उम्र में पाकिस्‍तान गया, वकालत कर बना मेजर; बेहद दर्दभरी है जासूस रविंद्र कौशिक की कहानी

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नई दिल्ली: सिनेमाघरों में इन दिनों रणवीर सिंह की फिल्म धुरंधर-2 बॉक्स ऑफिस के रिकॉर्ड तोड़ रही है लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्दे के इस धुरंधर से कहीं ज्यादा साहसी और जांबाज एक असली धुरंधर भारत के इतिहास में दर्ज है? यह कहानी है राजस्थान के एक उस नौजवान की जिसने पाकिस्तान की सेना में घुसकर मेजर का पद हासिल किया और सालों तक भारत के लिए जासूसी की. उसे दुनिया ब्लैक टाइगर के नाम से जानती है. नाम था रविंद्र कौशिक.

थिएटर से ‘रॉ’ तक का सफर
11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्मे रविंद्र कौशिक बचपन से ही अभिनय के शौकीन थे. लखनऊ में एक नाटक के दौरान उन्होंने एक भारतीय सैनिक की पूछताछ का ऐसा जीवंत अभिनय किया कि वहां मौजूद रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के अधिकारी दंग रह गए. यहीं से उनके जासूस बनने का सफर शुरू हुआ. रॉ ने उन्हें दिल्ली में दो साल की कड़ी ट्रेनिंग दी,जहां उन्हें इस्लामी धर्मशास्त्र, उर्दू और पाकिस्तानी लहजे की बारीकियां सिखाई गईं.

दुश्मन की सेना में मेजर का पद
महज 23 साल की उम्र में रविंद्र अपना सब कुछ छोड़कर नबी अहमद शाकिर बन गए और सीमा पार कर पाकिस्तान दाखिल हुए. उन्होंने कराची यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली और फिर पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गए. अपनी काबिलियत के दम पर वे मेजर के पद तक पहुंचे. 1979 से 1983 के बीच उन्होंने पाकिस्तान की परमाणु सुविधाओं (कहुटा) और पंजाब सेक्टर में सेना की गतिविधियों की ऐसी खुफिया जानकारी भारत भेजी जिसने देश की सुरक्षा को अभेद्य बना दिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी बहादुरी से खुश होकर उन्हें ब्लैक टाइगर की उपाधि दी थी.

एक गलती और 20 साल का नर्क
रविंद्र ने वहां एक स्थानीय महिला अमानत से शादी की और उनका एक बच्चा भी था. उनकी दोहरी जिंदगी बिल्कुल सही चल रही थी लेकिन 1983 में एक छोटी सी चूक ने सब तबाह कर दिया. भारत से भेजे गए एक अन्य गुर्ग इनायत मसीह को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने पकड़ लिया. टॉर्चर के दौरान उसने रविंद्र की पहचान उजागर कर दी. इसके बाद रविंद्र कौशिक को गिरफ्तार कर लिया गया.

गुमनाम मौत और वह आखिरी खत
पाकिस्तानी जेलों में रविंद्र को अमानवीय यातनाएं दी गईं. उन्हें मौत की सजा सुनाई गई जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया. जेल से अपने परिवार को लिखे एक खत में उन्होंने अपना दर्द बयां करते हुए पूछा था “क्या भारत जैसे बड़े देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?” साल 2001 में टीबी और हृदय रोग के कारण मियांवाली जेल में इस महान देशभक्त की गुमनाम मौत हो गई. उन्हें जेल के पीछे ही एक अज्ञात कब्र में दफना दिया गया. आज जब हम ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों का जश्न मनाते हैं तब रविंद्र कौशिक का बलिदान हमें याद दिलाता है कि असली नायक पर्दे पर नहीं बल्कि सरहदों के पार गुमनामी में देश के लिए जान देते हैं.

सवाल-जवाब

रविंद्र कौशिक को ‘ब्लैक टाइगर’ की उपाधि किसने दी थी?

उनकी अद्भुत जासूसी और बहादुरी को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘ब्लैक टाइगर’ के नाम से संबोधित किया था.

रविंद्र कौशिक की पहचान कैसे उजागर हुई?

1983 में रॉ के एक अन्य एजेंट इनायत मसीह के पकड़े जाने और पूछताछ के दौरान नाम उगल देने के कारण रविंद्र कौशिक की पहचान उजागर हुई थी.

पाकिस्तान में रविंद्र कौशिक किस पद तक पहुंचे थे?

वे अपनी पहचान छिपाकर पाकिस्तानी सेना में शामिल हुए और वहां पदोन्नति पाकर ‘मेजर’ के रैंक तक पहुंचे थे.



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