कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय उबाल पर है. जहां एक तरफ ममता बनर्जी अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा भी पूरी मजबूती के साथ मैदान में डटी हुई है. लेकिन इन दो बड़ी ताकतों के बीच असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर गठजोड़ ने राज्य में हलचल मचा दिया है. यह गठबंधन क्या वाकई चुनावी तस्वीर बदल सकता है या फिर सिर्फ ‘वोट कटवा’ बनकर रह जाएगा? यही सवाल इस वक्त बंगाल की राजनीति में सबसे ज्यादा गूंज रहा है. आइए समझते हैं पूरी कहानी.
अल्पसंख्यक वोट बैंक पर सीधी नजर
बंगाल की राजनीति में मुस्लिम वोट हमेशा से निर्णायक रहे हैं. यही वजह है कि ओवैसी-कबीर गठजोड़ ने सीधे इसी वोट बैंक पर फोकस किया है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर अल्पसंख्यक वोटों में थोड़ा भी बंटवारा हुआ, तो इसका नुकसान ममता की पार्टी टीएससी को उठाना पड़ सकता है. यह सच है कि इस इलाके में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मजबूत पकड़ रही है, लेकिन इस बार चुनौती अलग तरह की नजर आ रही है.
AIMIM का बिहार की तरह बंगाल में चुनाव लड़ने का प्लान
मीडिया रिपोर्ट की माने तो AIMIM इस चुनाव में ज्यादा सीटों पर नहीं लड़ने के मूड में है, बल्कि चुनिंदा सीटों पर दांव लगाने की तैयारी में है. बताया जा रहा है कि पार्टी 50 से भी कम सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है. यह वही रणनीति है जिसे पार्टी पहले बिहार में अपना चुकी है और वहां उसे अच्छा फायदा भी मिला था. अब इसी फॉर्मूले को बंगाल में दोहराने की कोशिश हो रही है.
ओवैसी का ‘फुल ऑन’ प्रचार मोड
इसी को देखते हुए ओवैसी 25 मार्च को कोलकाता पहुंचने वाले हैं, ओवैसी का बंगाल दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं होगा, बल्कि पूरी तरह चुनावी मोड में रहेगा. लगातार रैलियां, जनसभाएं और ग्राउंड कनेक्ट—पार्टी हर स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगी. उनकी मौजूदगी से कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ने की उम्मीद है, जिससे गठजोड़ को जमीन पर फायदा मिल सकता है.
मालदा-मुर्शिदाबाद: जहां से बदल सकता है खेल
मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिले इस चुनाव में सबसे अहम माने जा रहे हैं, क्योंकि यहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या काफी ज्यादा है. मुर्शिदाबाद में 22 सीटें हैं, जिनमें पिछली बार TMC ने 20 पर जीत दर्ज की थी. वहीं दूसरी तरफ मालदा में 12 सीटें हैं, जहां भी TMC का दबदबा रहा है. ऐसे में अगर वोटों का समीकरण थोड़ा भी बदला, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं.
कबीर फैक्टर क्या बंगाल में दिखाएगा कमाल?
हुमायूं कबीर का प्रभाव खासतौर पर मुर्शिदाबाद के कुछ इलाकों में माना जाता है. पहले वे TMC में शामिल थे, लेकिन अब पार्टी से अलग होकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं. हालांकि उनकी पार्टी नई है और संगठन अभी उतना मजबूत नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ इस गठजोड़ को मजबूती दे सकती है.
TMC को ओवैसी-कबीर गठजोड़ से कोई नहीं परेशानी?
TMC इस गठजोड़ को ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रही. पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनाव ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा और जनता का भरोसा उनके साथ है. साथ ही TMC ने इसके साथ आरोप लगाया है कि इस गठबंधन के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका हो सकती है, हालांकि AIMIM इन आरोपों को सिरे से खारिज करती नजर आ रही है.
बंगाल में कर देंगे हुमायूं-ओवैसी ‘खेला’?
अगर पूरे राजनीतिक समीकरण को देखें, तो साफ लगता है कि इस बार बंगाल का चुनाव सिर्फ जीत-हार का नहीं, बल्कि वोटों के बंटवारे का खेल बनता जा रहा है. ओवैसी-कबीर गठजोड़ भले ही सीधे सत्ता तक न पहुंचे, लेकिन अगर इसने थोड़े भी वोट काट लिए, तो TMC के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं और मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है. इतना तय है कि इस बार बंगाल का चुनाव पहले से ज्यादा कड़ा, दिलचस्प और अनिश्चित होने वाला है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सच में हुमायूं-ओवैसी ‘खेला’ कर देंगे या सिर्फ वोट कटवा की निभाएंगे भूमिका. अब ये आने वाला समय बताएगा.




