अमेरिकी अंडर सेक्रेटरी ऑफ वॉर फॉर पॉलिसी एल्ब्रिज कोल्बी ने कहा कि अमेरिका और भारत दोनों को ऐसे इंडो-पैसिफिक से फायदा होता है जहां कोई भी देश पूरे क्षेत्र पर हावी न हो सके. अमेरिका मानता है कि भारत इंडो-पैसिफिक में पावर बैलेंस करने में सेंट्रल रोल में होगा. कोल्बी ने कहा कि अमेरिका भारत के साथ सहयोग सिर्फ अहम मुद्दों पर काम करने के लिए नहीं, बल्कि भारत को मजबूत और सक्षम बनाने के लिए भी कर रहा है ताकि दोनों देशों के हितों के लिए क्षेत्र में अनुकूल शक्ति संतुलन बना रहे.
अमेरिकी अधिकारी ने कहा, अमेरिका भारत को बहुत सम्मान के साथ देखता है. एक विशाल गणराज्य के रूप में, एक देश जिसकी रणनीतिक परंपरा गर्वपूर्ण है, और एक ऐसा देश जिसकी फैसले इंडो-पैसिफिक और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को गहराई से प्रभावित करेंगे. उन्होंने कहा, हमारे दोनों देशों की इतिहास, भूगोल और नजरिए में कई फर्क हैं, लेकिन हम एक बुनियादी बात साझा करते हैं कि एशिया का भविष्य संप्रभु देशों द्वारा तय होना चाहिए.
डिफेंस सेक्टर में काफी मजबूत पार्टनर
कोल्बी ने बताया कि अमेरिका भारत के साथ अपने संबंधों को जियोपॉलिटिकली और डिफेंस सेक्टर में काफी मजबूत पार्टनर की तरह देखता है. यह तरीका भारत के नजरिए से भी पूरी तरह मेल खाता है, जिससे दोनों देशों की साझेदारी मजबूत और टिकाऊ बनती है. कोल्बी ने कहा कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जब वैश्विक शक्ति में बड़ा बदलाव हो रहा है. इंडो-पैसिफिक अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा का केंद्र बन गया है. भारत और अमेरिका दोनों के हित और भविष्य इस क्षेत्र में होने वाले बदलावों से तय होंगे. उन्होंने कहा कि एशिया में स्थिर शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए किसी एक देश के भरोसे नहीं रहा जा सकता, बल्कि यह कई सक्षम देशों के साझा प्रयासों पर निर्भर करेगा.
भारत की अहमियत सिर्फ उसके आकार से नहीं
कोल्बी ने कहा कि भारत की अहमियत सिर्फ उसके आकार और आर्थिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति से भी है. भारत इंडो-पैसिफिक के केंद्र में है, उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की लंबी परंपरा है, और वह अपनी सीमाओं से बाहर भी घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणराज्य है, उसकी सफलता का प्रतीकात्मक और राजनीतिक असर गहरा है, और उसकी सेना सक्षम और आत्मनिर्भर है. कोल्बी ने कहा कि अमेरिका भारत को सिर्फ एक अहम साझेदार नहीं, बल्कि एशिया में अनुकूल शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी साझेदार मानता है. उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर का नजरिया अमेरिका के नजरिए से कई स्तरों पर मेल खाता है, खासकर मूल सोच में. दोनों मानते हैं कि देशों को अपने हितों की रक्षा और बढ़ाने में आत्मविश्वास से काम करना चाहिए, और यही सही भी है. दोनों मानते हैं कि ठोस राष्ट्रीय हितों पर आधारित विदेश नीति सहयोग और शांति के लिए मजबूत आधार बनाती है. दोनों मानते हैं कि एशिया में टिकाऊ और स्थिर शक्ति संतुलन सबसे जरूरी है.
साझेदारी की जड़ें दिखावे से कहीं गहरी और टिकाऊ
कोल्बी ने कहा कि जब अमेरिका अपने लोगों की सुरक्षा, समृद्धि और आजादी के लिए कदम उठाता है, और भारत भी अपने लोगों के लिए उतनी ही दृढ़ता से काम करता है, तो दोनों देशों के प्रयास एक-दूसरे को मजबूत करते हैं. उन्होंने कहा कि दोनों देशों को हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमत होने की जरूरत नहीं है, बल्कि हम लचीले हैं और सबसे जरूरी क्षेत्रों में सहमति तलाशते हैं. विदेश नीति व्यावहारिक होनी चाहिए और परिणामों पर केंद्रित होनी चाहिए. कोल्बी ने कहा कि अमेरिका-भारत संबंधों की ताकत यह है कि वे सिर्फ औपचारिकताओं पर नहीं, बल्कि साझा हितों की स्पष्ट समझ पर आधारित हैं. उन्होंने बताया कि दोनों देशों को हर बात पर सहमत होने की जरूरत नहीं है, बल्कि सबसे अहम मुद्दों पर उनके हित और लक्ष्य मिलते हैं. मतभेद और विवाद भी रणनीतिक मामलों में गहरे सहयोग के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं. साझेदारी की जड़ें दिखावे से कहीं गहरी और टिकाऊ हैं, वे साझा रणनीतिक हितों में गहराई से जुड़ी हैं. दोनों देशों को ऐसे इंडो-पैसिफिक से फायदा होता है जहां कोई भी शक्ति क्षेत्र पर हावी न हो सके.





