हरीश राणा ने त्‍यागा शरीर, लेकिन इच्‍छामृत्‍यु मांगने वाले इन 5 बदनसीबों के लिए सुप्रीम कोर्ट का नहीं पसीजा था दिल

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नई दिल्ली: 13 साल तक बिस्तर पर पत्थर की मूरत बने रहे हरीश राणा की रूह ने आज आखिरकार उस खामोश कैद से रिहाई पा ली. हरीश के परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर माथा रगड़कर इच्छा मृत्यु की भीख मांगी थी ताकि उनका बेटा उस अंतहीन दर्द से आजाद हो सके. हरीश तो मौत की आगोश में सो गए लेकिन भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसे कई बदनसीब रहे हैं जिनके लिए जिंदगी एक बोझ बन गई थी, पर सुप्रीम कोर्ट ने ममता उन पर नहीं बरसी. चलिए ऐसे ही कुछ मामलों के बारे में आपको बताते हैं.

1. पी. रथ‍िनम बनाम भारत संघ (1994)
इस मामले में कोर्ट ने शुरू में माना था कि जीने के अधिकार में मरने का अधिकार भी शामिल है. लेकिन बाद में बड़ी बेंच ने इस फैसले को पलट दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार प्राकृतिक है जबकि मृत्यु अप्राकृतिक है, इसलिए इच्छा मृत्यु को मौलिक अधिकार नहीं माना जा सकता.

2. ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996)
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस ऐतिहासिक मामले में साफ कर दिया कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, ‘मरने का अधिकार’ नहीं. कोर्ट ने इच्छामृत्यु की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह जीवन की सुरक्षा के सिद्धांत के खिलाफ है.

3. अरुणा रामचंद्र शानबाग केस (2011)
42 साल तक कोमा में रहीं नर्स अरुणा के लिए उनके दोस्त ने दया मृत्यु मांगी थी. कोर्ट ने एक्टिव यूथेनेशिया (जहर देना) को पूरी तरह खारिज कर दिया. हालांकि, पैसिव यूथेनेशिया के लिए कड़े नियम बनाए लेकिन अरुणा के मामले में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति नहीं दी गई और उनकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई.

4. कॉमन कॉज (रजि.) बनाम भारत संघ (2018)
इस मामले में कोर्ट ने लिविंग विल को मान्यता तो दी लेकिन प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया कि व्यवहार में इसे लागू करना लगभग असंभव हो गया. कई गंभीर रूप से बीमार मरीजों ने सरल प्रक्रिया की मांग की थी जिसे कोर्ट ने सुरक्षा कारणों से बेहद सख्त और तकनीकी रखा.

5. कंचन देवी बनाम राजस्थान राज्य
गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के कई ऐसे व्यक्तिगत आवेदन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं जहां परिवार ने आर्थिक तंगी और असाध्य दर्द का हवाला दिया. कोर्ट ने ऐसे मामलों में यह कहते हुए याचिकाएं ठुकराईं कि भारतीय कानून में अभी भी सक्रिय इच्छा मृत्यु के लिए कोई जगह नहीं है.

सवाल-जवाब
भारतीय कानून में ‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ इच्छा मृत्यु में क्या अंतर है?

सक्रिय (Active) में घातक इंजेक्शन देकर जान ली जाती है जो भारत में अवैध है, जबकि निष्क्रिय (Passive) में केवल जीवन रक्षक प्रणाली (Ventilator) हटा दी जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ऐसी याचिकाओं को अक्सर क्यों ठुकरा देता है?

कोर्ट को डर रहता है कि इच्छा मृत्यु के कानून का दुरुपयोग बुजुर्गों या बीमारों की संपत्ति हड़पने या उन्हें बोझ समझकर मारने के लिए किया जा सकता है.



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