Last Updated:
Gen Z voters in West Bengal election 2026 : पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में टीएमसी और बीजेपी ने युवाओं को लुभाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. जहां ममता बनर्जी ने ‘युवा साथी’ योजना के जरिए ₹1500 मासिक भत्ते का दांव चला है, वहीं बीजेपी ने 40 साल से कम उम्र के उम्मीदवारों को प्राथमिकता देकर एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव का संकेत दिया है. बंगाल के रण में इस बार हवा का रुख कुछ बदला-बदला सा है. दोनों ने अपनी पुरानी रणनीतियों को दरकिनार कर ‘यूथ कार्ड’ पर सबसे बड़ा दांव खेला है. दोनों के केंद्र में क्यों जेन-जी (Gen-Z) वोटर हैं और इनकी खामोशी ने क्यों बड़े-बड़े दिग्गजों की नींद उड़ा रखी है?
बंगाल में किस पार्टी ने जेन-जी को सबसे ज्यादा टिकट दिया?
कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का चुनाव केवल दो विचारधाराओं की लड़ाई नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच तालमेल बिठाने की चुनौती बन गया है. ममता बनर्जी जहां इस चुनाव में अपने कई पुराने विधायकों का टिकट काट कर जेन-जी पर दांव खेला है. वहीं, बीजेपी ने भी ममता बनर्जी के नहले पर 40 प्रतिशत से अधिक जेन-जी को टिकट देकर दहला फेंक दिया है. राज्य की लगभग 7 करोड़ की मतदाता सूची में एक बड़ा हिस्सा उन युवाओं का है जो पहली या दूसरी बार मतदान करेंगे. यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही पार्टियां इस ‘जेन-जी’ फैक्टर से डरी हुई हैं और उन्हें साधने के लिए लुभावने वादों और संगठनात्मक बदलावों का सहारा ले रही हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 20 मार्च 2026 को अपनी पार्टी का चुनावी घोषणापत्र जारी किया, जिसमें सबसे अधिक चर्चा ‘युवा साथी’ योजना की हो रही है. इस योजना के तहत 21 से 40 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को प्रति माह 1,500 रुपये और सालाना 18,000 रुपये देने का वादा किया गया है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी ने ‘लक्ष्मी भंडार’ की सफलता को युवाओं पर दोहराने की कोशिश की है. अभिषेक बनर्जी, जिन्हें पार्टी में युवा चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा है, लगातार रोजगार और उद्योग की बात कर रहे हैं ताकि पलायन के मुद्दे पर घिरी सरकार को बचाया जा सके.
दूसरी ओर, बीजेपी ने इस बार टिकट वितरण में चौंकाने वाला फैसला लिया है. पार्टी के पहले दो सूचियों में 25% से अधिक उम्मीदवार 40 साल से कम उम्र के हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार का पूरा जोर इस बात पर है कि राज्य का युवा ‘भय और भ्रष्टाचार’ के माहौल से बाहर निकलना चाहता है. बीजेपी का तर्क है कि ‘कट मनी’ और ‘सिंडिकेट राज’ ने युवाओं के भविष्य को अंधकार में डाल दिया है. पार्टी युवाओं को ‘सोनार बांग्ला’ का सपना दिखाकर यह भरोसा दिलाना चाहती है कि केवल उद्योग और केंद्रीय योजनाओं से ही उनका भला हो सकता है.
दोनों पार्टी युवाओं को ‘सोनार बांग्ला’ का सपना दिखाकर भरोसा दिलाना चाहती है. (फाइल फोटो)
क्या है पार्टियों के डर की वजह?
असल में, दोनों पार्टियों को डर इस बात का है कि जेन-जी वोटर पारंपरिक पहचान की राजनीति धर्म या जाति के बजाय परिणाम पर यकीन करता है. सोशल मीडिया के इस दौर में युवा वोटर्स को केवल नारों से बहलाना मुश्किल है. टीएमसी को डर है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और रोजगार की कमी के कारण युवा उनसे छिटक न जाए, वहीं बीजेपी को डर है कि ममता की ‘कैश ट्रांसफर’ वाली स्कीम्स युवाओं को उनकी ओर जाने से रोक सकती हैं.
टीएमसी ने इस बार सिर्फ 25 प्रतिशत ही 60 साल से अधिक उम्र के उम्मीदवार को टिकट दिया है. 2021 में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत था. टीएमसी जिन 219 उम्मीदवारों को टिकट दिया, उनकी आयु 60 साल से कम है. हालांकि पार्टी ने 83 साल के समर मुखर्जी और 82 साल के शोभनदेव चट्टोपध्याय जैसे दिग्गजों को टिकट देकर बता दिया है कि अनुभव और विरासत को पूरी तरह दरकिनार किया जा सकता है. बीजेपी ने 255 उम्मीदवारों की सूची में 196 प्रत्याशी यानी लगभग 76 प्रतिशत कैंडिडेट 55 साल के कम उम्र के हैं. 65 कैंडिडेट तो 40 साल से कम उम्र के हैं. बीजेपी ने इस बार 43 शिक्षक, 8 डॉक्टर और 11 वकील को टिकट दिया है.
About the Author

भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले रविशंकर सिंह सहारा समय न्यूज चैनल, तहलका, पी-7 और लाइव इंडिया न्यूज चैनल के अलावा फर्स्टपोस्ट हिंदी डिजिटल साइट में भी काम कर चुके हैं. राजनीतिक खबरों के अलावा…और पढ़ें




