कोरोना के बाद ईरान जंग ने भी दिखाया, गांधीजी के ‘सपनों का गांव’ ही है संकट का साथी-Opinion

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दुनिया ने ईरान युद्ध से बहुत सारे सबक लिए होंगे, लेकिन बहुत सारे भारतीय लोगों को ऐसे में गांवों की बहुत याद आ रही है. कम से साल 1985 से पहले जन्म लेने वालों को. क्योंकि यही वो वक्त था जब गांवों कस्बों के बहुत सारे लोगों ने रोजी-रोजगार के लिए बड़े शहरों का रुख किया था. दिल्ली एनसीआर से लेकर बेंगलुरु, पंजाब और सूरत तक निकल पड़े थे. पहले भी जाते थे. लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद ये हिजरत तेज हुई. बाद में पैदा लोगों को भूला नहीं होगा कि इस दशक की शुरुआत में कोरोना के बाद भी बहुत सारे लोग गांवों को याद कर रहे थे. बहुत से गांव चले भी गए थे. अभी सूरत से कुछ तसवीरें आईं थी जिन्हें देख कर उस दौर में हुए रीवर्स माइग्रेशन की याद ताजी हो गई थी.

हालांकि ये सच है कि हिजरत यानी से यहां से वहां जाने की प्रवृति जीव मात्र की नेचुरल सोच है. पक्षी से लेकर शिकारी जानवर तक यहां वहां घूमते रहते हैं. लेकिन वे सब लौट कर अपनी जमीन अपने घोसलों तक लौटते हैं. हाल में बेहतर लाइफ स्टाइल के लिए, बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए एक बड़ी जनसंख्या ने महानगरों को अपना घर ही बना लिया. या बनाने को मजबूर हो गए. गांवों का आलम ये है कि किसी भोज में बुलाया जाय तो बहुत थोड़े से ही लोग शामिल हो पाते हैं. जिनके पास समार्थ्य है उन्होंने महानगरों में अपनी रिहाइश बना ली है और जिनके पास क्षमता नहीं है वे रोजगार के लिए गांव से निकल जहां तहां अपना गुजारा कर रहे हैं.

1985 से पहले ज्यादातर लोगों का परिवार गांवों में रहता था. वे कमा कर गांव में भेजते थे. अब वो सिलसिला भी तकरीबन खत्म हो गया है. बहुत सारे लोगों ने बुजुर्ग मां-बाप को भी उनकी देखरेख के लिए शहरों में बुला लिया है. ये सब उस मुल्क में हो रहा है जहां के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आज से तकरीबन सौ साल पहले हर अंदेशे को भांप लिया था. तभी तो उन्होंने ग्राम स्वराज की बात की थी. गांवों को एक पूरी आत्मनिर्भर यूनिट के तौर पर विकसित करने की बात की थी. अगर भारत उसी दिशा में चला होता तो कहानी क्या होती समझते हैं.

गांव को लेकर महात्मा गांधी का सपना अब भी साकार किया जा सकता है. वो भी आधुनिकता के साथ. (AI फोटो)

पश्चिम एशिया में मची अशांति के बीच सबसे अहम सवाल यही उठ रहा है कि खाना बनाने के लिए अगर गैस नहीं मिली तो फ्लैट में रहने वाले क्या करेंगे. मिल भी जाए तो एनजीटी दिल्ली एनसीआर में कोयला या लकड़ी नहीं जलाने देगी. रोज मीडिया प्लेटफार्मों पर अफवाह दिख रही है कि गैस नहीं मिल रही है. लोग इंडक्शन प्लेट खरीदने में लग गए हैं. ईंधन का बड़ा हिस्सा दुनिया के उसी इलाके से आता है जहां जंग की आग धधक रही है. लिहाजा लोगों के मन का अंदेशा बहुत गलत भी नहीं है. अब लगता है कि किसी शायर ने ठीक ही कहा है –

तुम्हारे पास ही रहते न छोड़ कर जाते
तुम्हीं नवाज़ते तो क्यों इधर-उधर जाते

यहां ये कहना भी जरूरी है कि देश की सरकार ने साफ कर दिया है कि ईंधन को लेकर देश में कोई दिक्कत नहीं आने वाली है. लेकिन अंदेशा तो अंदेशा है. एक बार आ जाता है तो जाता ही नहीं. इस लिहाज से फिर से एक बार माहात्मा गांधी की बात याद आती है. अगर गांव आत्मनिर्भर रहे होते तो दुनिया भर में लगी आग के बाद भी हम अपने बारे में सोचने को मजबूर न होते. गांव का अपना पूरा सिस्टम होता जैसे देश का है. गांव अपनी सरहद में रहने वालों को खाने का अनाज, पोषण के लिए दूध और खाना पकाने के लिए ईंधन बड़ी ही सहजता से दे रहा होता. नहीं हम महज गोबर गैस की बात नहीं कर रहे. ऊर्जा के दूसरे जो भी वैकल्पिक संसाधन हैं वे गांवों में चलते. ये वो मुल्क है जहां सूरज खूब रोशनी देता है, हवाएं ज्यादातर हिस्सों में खूब चलती हैं. मतलब सोलर एनर्जी और पवन चक्की से भी एनर्जी मिल सकती है. बहुत सारे इलाकों में वहां के निवासी अतिरिक्त बिजली सरकार को बेंच भी रहे हैं. गांव का माहौल जिसने देखा है, महसूस किया है वो समझता है कि वहां क्या क्या है जो अच्छे से अच्छे शहर में नहीं है.

हां, अगर महात्मा गांधी के सपने के मुताबिक गांवों की तरक्की की गई होती तो गांव हर तरह से उतना ही मजबूत यूनिट होता जैसा आज के शहर हैं. ये तो शहरों के विकास के लिए गांवों की बलि लेने का नतीजा है कि गांव में घर खाली दिख रहे हैं. गांधी का सबसे कम नाम लेने वाला चीन पहले ही ऐसा कर चुका है. उसके गांवों में बिजली नहीं कटती. गांवों में जाने के लिए बेहतरीन सड़के हैं. मीडिया रिपोर्ट सही हैं तो वहां के 94 परसेंट गांवों में टैब वॉटर की सप्लाई है. गांवों में सामुदायिक केंद्र हैं और नर्सिग होम भी हैं. जहां हमारे विपरीत डॉक्टर वगैरह उपलब्ध रहते हैं. इंटरनेट की अच्छी कनेक्टिविटी है. अगर हमने गांधी की राह अपनाई होती तो हम भी अपने गांवों को अब तक उसी लेबल पर पहुंचा पाए होते.

फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत के गांवों को भी उस लेबल तक पहुंचाया जा सकता है. अभी भी ये काम हो सकता है. एक अच्छी बात इस दरम्यान ये हुई है कि देश भर में एक्सप्रेसवे का जाल फैल गया है. हर दिशा में उनसे गांवों का संपर्क मार्ग भी बन गया है. अब दिक्कत ये रह गई है कि लोगों को रोजगार देने वाली कंपनियां- फैक्टरियां एक ही जगह बनाई जा रही हैं. अगर इन जगहों का सेचुरेशन हो भी जा रहा है तो बगल में ही पहले वाली ही जगह के बगल में ग्रेटर और लार्जर नाम से दूसरी जगह देकर कंपनियों – फैक्टरियों का विस्तार किया जा रहा है.

अभी भी ये किया जा सकता है कि सारा इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया करा कर सूदूर इलाके में नई यूनिटों की स्थापना की जाए. हमारे एक्सप्रेस वे और रेलवे का नेटवर्क इसके लिए अनुकूल बनाया जा चुका है. बस जरा सा विकास को गांधी का चश्मा पहना देने की जरुरत है. वो चश्मा जो गांवों के विकास को देखता है. वो चश्मा जो गांव में ही अपनी पूरी सरकार देखता है. दिल्ली और राज्यों की राजधानी की सरकारें बस जिसे थोड़ा सहारा देने के लिए और दुनिया भर से भिड़ने बतियाने का काम देखें. बाकी सारी व्यवस्था गांव की सरकार देखे. जिसके हेड प्रधान या सरपंच हों. कहने को अभी भी ग्राम पंचायत, नगर पंचायत और जिला पंचायत परिषद सब कुछ बना है. लाखों खर्च करके लोग ही इनके मुखिया भी बन रहे हैं, लेकिन अभाव है तो सिर्फ गांधीवादी नजरिए का. आत्मनिर्भर गांव के निर्माण की प्रक्रिया में जुट जाने की कमी है. ऐसा नहीं कि कांग्रेस पार्टी की सरकारें थी तो वे इस दिशा में काम कर रही थी. वो तो राजीव गांधी के पीएम बनने के बाद देश के बहुत सारे इलाकों में त्रीस्तरीय पंचायती राज की ओर कुछ काम हुआ. वरना तो बरसों से कई इलाकों में चुनाव तक नहीं हुए थे.

पहले कोरोना और अब युद्ध ने हमें इसका सबक दिया है कि अगर गांव मजबूत हों, किसी ऑटोनोमस यूनिट की तरह गांव की सारी व्यवस्था संभालने में काबिल हों तो हमें कुदरती और इंसानी फितूर से पैदा हुए जंग जैसे हालत में भी सुरक्षित रख सकती है.



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