जीत, हार और यादों के गवाह! दो पते, एक इतिहास; कांग्रेस की धड़कनों की कहानी

Date:


विवेक शुक्ला

अशोक उपाध्याय किसी भी हालत में 5 रायसीना रोड के आगे से गुजरना पसंद नहीं करते. उस सड़क के आसपास से गुजरते वक्त उनके सामने हमेशा 11 सितंबर 1993 की मनहूस यादें ताजा हो जाती हैं. उसी दिन रायसीना रोड पर स्थित भारतीय युवा कांग्रेस के दफ्तर के सामने हुए भीषण कार बम विस्फोट में उनके पिता शिव दुलारे उपाध्याय की मौत हो गई थी. इस हमले में उनके पिता अलावा नौ अन्य लोगों की जान चली गई थी, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. उस धमाके की गूंज दिल्ली ने कई दिनों तक महसूस की थी.

उस हादसे के करीब 33 साल बाद केंद्र सरकार के संपदा विभाग ने कांग्रेस पार्टी को उसके लंबे समय तक मुख्यालय रहे 24 अकबर रोड और 5 रायसीना रोड के बंगलों को खाली करने के आदेश दिए हैं. 5 रायसीना रोड में युवा कांग्रेस का 1976 से मुख्यालय था.

भीषण धमाका

11 सितंबर 1993 को शनिवार का दिन था, रायसीना रोड पर ट्रैफिक अपेक्षाकृत कम था. शास्त्री भवन, उद्योग भवन, रेल भवन आदि सरकारी कार्यालयों में छुट्टी होने के कारण सड़कों पर भी भीड़ कम थी. लेकिन, युवा कांग्रेस के दफ्तर और उसके ठीक बगल वाले होटल मेरिडियन में काफी हलचल थी. मेरिडियन होटल में थाईलैंड में बसे भारतीय मूल के बिजनेसमैन सुराचन चावला कुछ पत्रकारों को इंटरव्यू दे रहे थे. उनमें एक लेखक भी शामिल था. सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा था. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कुछ ही पलों में भयानक विस्फोट हो जाएगा, जिसमें कई बेकसूरों की जान चली जाएगी.

भूकंप जैसा धमाका

दोपहर करीब डेढ़-दो बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म हुई. उसके तुरंत बाद जोरदार धमाका हुआ. विस्फोट इतना तेज था कि लगा कान फट जाएं. कुछ देर तक कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. प्रेस कॉन्फ्रेंस मेरिडियन होटल की सातवीं मंजिल पर हो रही थी. विस्फोट होते ही लगा जैसे भूकंप आ गया हो. हॉल के शीशे चकनाचूर हो गए. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति रहा हो जो कांप न रहा हो. टूटे शीशों के टुकड़े कई लोगों के शरीर में घुस गए थे. धमाके के बाद चारों तरफ अफरा-तफरी और दहशत का माहौल था. बाहर धुएं का गुबार उठ रहा था. टूटे शीशों के कारण बाहर कुछ खास दिखाई भी नहीं दे रहा था. किसी को अभी तक यह पता नहीं था कि असल में क्या हुआ है. स्वादिष्ट लंच बिखर चुका था. धमाके ने सबकी भूख मिटा दी थी.

कांग्रेस दफ्तर के बाहर इसी गाड़ी में ब्लास्ट हुआ था.

कार में विस्फोट

जब भयभीत लोग अभी संभल ही रहे थे, होटल के एक स्टाफ सदस्य ने आकर कहा, ‘सीढ़ियों से नीचे आइए, लिफ्ट बंद कर दी गई हैं.’ भगवान का नाम लेते हुए पत्रकार और अन्य लोग सीढ़ियों से उतरने लगे. इतना तो समझ आ ही गया था कि नुकसान बहुत बड़ा हुआ है. होटल की लॉबी में पहुंचकर पता चला कि युवा कांग्रेस के दफ्तर के सामने एक कार में विस्फोट हुआ है.

लॉबी से बाहर पुलिस की सायरन की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं. करीब पौने घंटे बाद जब हम होटल से बाहर निकले तो चारों तरफ अफरा-तफरी का मंजर था. पुलिस घायलों को राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचा रही थी. पूरे इलाके को पुलिस ने घेर लिया था. मेरिडियन होटल के गेट से ही युवा कांग्रेस दफ्तर में हुए हादसे का अंदाजा लगाया जा सकता था.

धमाके में मनिंदर बिट्टा घायल

धमाके के समय कांग्रेस नेता मनिंदर सिंह बिट्टा युवा कांग्रेस के दफ्तर में मौजूद थे. वे भी घायल हुए थे. धमाके से कुछ मिनट पहले ही सोशल वर्कर जितेंद्र सिंह शंटी (जो आजकल पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं), उनसे मिलकर रकाबगंज गुरुद्वारा की तरफ निकल गए थे. शंटी बाद में कह रहे थे कि अगर वे वहां रुक गए होते तो कुछ भी हो सकता था.

अटल जी के घर से कौन निकला था?

यमुना सफाई अभियान के संयोजक अशोक उपाध्याय बताते हैं, ‘मेरे पिता शिव दुलारे उपाध्याय 1991 में हिंदुस्तान टाइम्स से रिटायर हो गए थे. उस दिन वे अटल बिहारी वाजपेयी के घर अखबार-मैगजीन देने गए थे. उन दिनों वाजपेयी 6 रायसीना रोड पर रहते थे (जहां अब भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी रहते हैं).’ शिव दुलारे जी अटल जी के घर से निकलकर पैदल किदवई भवन की तरफ जा रहे थे. तभी विस्फोट हुआ और बम के कुछ हिस्से उनके शरीर पर गिरे. उनकी मौके पर ही मौत हो गई. शिव दुलारे के छलनी शरीर की तस्वीर अगले दिन राजधानी के लगभग सभी अखबारों ने पहले पन्ने पर छापी थी. वह तस्वीर आतंकवाद के भयावह चेहरे को बेनकाब कर रही थी.

अशोक उपाध्याय कहते हैं, ‘पिता जी की अकाल मौत से हमारा परिवार कभी उबर नहीं पाया.’ इस धमाके के लिए देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर को सुप्रीम कोर्ट ने शुरू में मौत की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में 31 मार्च 2014 को उम्रकैद में बदल दिया गया.

कांग्रेस दफ्तर में छाई उदासी

उधर, राजधानी के लुटियंस जोन में स्थित 24 अकबर रोड और 5 रायसीना रोड के दफ्तरों के बाहर गुरुवार को उदासी छाई हुई थी. इन दोनों जगहों पर सिर्फ गिनती के लोग ही नजर आ रहे थे. कांग्रेस के लिए ये दोनों बंगले मात्र कार्यालय नहीं, बल्कि पांच दशक से अधिक पुरानी राजनीतिक विरासत के जीवंत प्रतीक रहे हैं.

कांग्रेस का दफ्तर होगा खाली

बीते 25 मार्च संपदा विभाग ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इन दोनों परिसरों को 28 मार्च तक खाली करने का अंतिम नोटिस जारी किया है. पार्टी ने जनवरी 2025 में 9ए कोटला मार्ग पर अपना नया मुख्यालय उद्घाटित कर लिया था, लेकिन कुछ विभाग अभी भी पुराने दफ्तरों से काम चला रहे थे.

कांग्रेस का ‘नर्व सेंटर’

24 अकबर रोड का सफेद रंग का टाइप-7 बंगला 1978 में कांग्रेस का मुख्यालय बना था. आपातकाल के बाद 1977 के चुनावों में इंदिरा गांधी की हार और कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा गुट के पास कोई दफ्तर नहीं बचा था. आंध्र प्रदेश के राज्यसभा सांसद जी. वेंकटस्वामी ने अपना आवंटित बंगला पार्टी को सौंप दिया. इससे पहले कांग्रेस का मुख्यालय 7 जंतर मंतर रोड पर था, जो 1971 में 5 राजेंद्र प्रसाद रोड चला गया. 24 अकबर रोड को शुरू में अस्थायी ठिकाना माना गया था, लेकिन यह 48 वर्षों तक पार्टी का ‘नर्व सेंटर’ बना रहा.

उतार-चढ़ाव के गवाह

इस बंगले ने कांग्रेस के उतार-चढ़ाव के हर दौर को देखा है. 1980 में इंदिरा गांधी की भारी जीत, 1984 में उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, 1989 की हार, पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में 1991 के आर्थिक सुधार, 1996-2004 का विपक्षी दौर, सोनिया गांधी के नेतृत्व में 2004 वापसी की, लेकिन, 2014 में पार्टी को करारी हार मिली.

इंदिरा से खरगे तक बने अध्यक्ष

इसी दफ्तर से कांग्रेस के सात अध्यक्षों ने पार्टी की कमान संभाली. इस दफ्तर से इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, सीताराम केसरी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी की कमान संभाली.

जब यह था ‘बर्मा हाउस’

जाने-माने पत्रकार रशीद किदवई की किताब 24 अकबर रोड में इस बंगले और कांग्रेस के गहरे संबंधों की विस्तार से चर्चा की गई है. 1960 के दशक में 24 अकबर रोड को ‘बर्मा हाउस’ भी कहा जाता था. दरअसल, म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) के भारत में राजदूत को यह बंगला सरकारी आवास के रूप में आवंटित किया जाता था. रशीद किदवई ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्देश पर इसे ‘बर्मा हाउस’ नाम दिया गया था. कारण था- बर्मा की राजदूत ‘दा खिन केय’ और पंडित नेहरू के बीच बेहद मधुर संबंध. उस समय भारत-बर्मा संबंध लगातार मजबूत हो रहे थे. म्यांमार की प्रमुख नेता आंग सान सू की ही दा खिन केय की पुत्री हैं. उनका बचपन भी यहां गुजरा है.

कोविड में कम्युनिटी किचन ये दफ्तर

अगर विस्फोट से हटकर बात करें तो कोविड काल में युवा कांग्रेस के दफ्तर से कम्युनिटी किचन चलाया गया, जहां जरूरतमंदों को भोजन पहुंचाया जाता था. युवा कांग्रेस के अध्यक्षों ने इसी जगह से कई रणनीतियां बनाईं. रायसीना रोड का यह बंगला कांग्रेस की युवा शाखा को मजबूत करने का प्रतीक रहा है. यहां से संजय गांधी ने भी काम किया.

अब आगे क्या?

ये दोनों दफ्तर महज इमारतें नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक यात्रा के साक्षी हैं-विजय और पराजय की. विभाजन और पुनरुत्थान की अनकही कहानियां. नया इंदिरा गांधी भवन आधुनिक और सुविधायुक्त है, लेकिन पुराने दफ्तरों से जुड़ी भावनाएं गहरी हैं. पार्टी अब कोर्ट जाने की संभावना जता रही है.



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related