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Jalor Hindi News: भीषण गर्मी के बीच जालोर के मोकलसर में देसी मटकियों की मांग तेजी से बढ़ रही है. लोग अब प्राकृतिक ठंडक के लिए फ्रिज के बजाय मिट्टी के घड़ों का इस्तेमाल करना पसंद कर रहे हैं. मटकी का पानी न केवल ठंडा होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माना जाता है. बढ़ती गर्मी के कारण बाजारों में मटकियों की बिक्री में जबरदस्त उछाल देखा जा रहा है. यह पारंपरिक तरीका एक बार फिर लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है.
गर्मी का असर बढ़ते ही जालोर जिले में देसी ठंडक की वापसी देखने को मिल रही है. चितलवाना सहित पूरे जिले में अब लोग फ्रिज के ठंडे पानी की बजाय मटकी के पानी को ज्यादा पसंद करने लगे हैं. तेज गर्मी के बीच मोकलसर में बनने वाली पारंपरिक मटकियों की मांग तेजी से बढ़ी है. प्राकृतिक ठंडक और स्वाद के कारण लोग एक बार फिर देसी घड़ों की ओर लौटते नजर आ रहे हैं.

मोकलसर की मटकियां अपनी खास मिट्टी और मजबूत बनावट के लिए जानी जाती हैं. इनमें रखा पानी लंबे समय तक ठंडा रहता है और इसमें हल्की सौंधी खुशबू भी महसूस होती है, जो स्वाद को और बेहतर बनाती है. यही वजह है कि बढ़ती गर्मी के बीच लोग इसे फ्रिज के पानी से बेहतर विकल्प मान रहे हैं.

मटकी बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक और मेहनत भरी होती है. इसके लिए रायथल के तालाबों से मिट्टी लाई जाती है, जिसमें लकड़ी का बुरादा मिलाकर एक खास मिश्रण तैयार किया जाता है. इसके बाद इस मिश्रण को चरखे पर घुमाकर मटकी का आकार दिया जाता है और फिर उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है.
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मटकी सूखने के बाद उसे करीब 12 घंटे तक भट्ठी में पकाया जाता है, जिससे यह मजबूत और टिकाऊ बन जाती है. कारीगर बताते हैं कि मटके बनाने का काम दिसंबर महीने से ही शुरू हो जाता है, ताकि गर्मियों में बढ़ती मांग को समय पर पूरा किया जा सके. एक कुम्हार दिनभर में करीब 25 से 30 मटकियां तैयार कर लेता है.

मटकी के इस बढ़ते चलन से कुम्हार परिवारों को भी अच्छा रोजगार मिल रहा है. चितलवाना सहित जालोर जिले के विभिन्न इलाकों में इनकी बिक्री तेजी से बढ़ी है. अब मोकलसर की मटकियां राजस्थान के साथ-साथ गुजरात तक भी पहुंच रही हैं, जिससे देसी घड़ों की यह परंपरा एक बार फिर मजबूत होती नजर आ रही है.





