रेगिस्तान का पत्थर बना ग्लोबल स्टार! जालौर की ग्रेनाइट सिटी से 125 रंगों में दुनिया भर में हो रही सप्लाई

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जालौर: रेगिस्तान का पत्थर… आज देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में अपनी चमक बिखेर रहा है. हम बात कर रहे हैं राजस्थान के जालौर की, जिसे एशिया की सबसे बड़ी ग्रेनाइट सिटी के रूप में जाना जाता है. अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा जालौर आज अपने ग्रेनाइट उद्योग के दम पर एक अलग पहचान बना चुका है. यहां से निकलने वाले पत्थर अब सिर्फ स्थानीय जरूरतों तक सीमित नहीं, बल्कि देश के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक अपनी पहुंच बना चुके हैं.

जालौर की सबसे बड़ी खासियत है, यहां मिलने वाले ग्रेनाइट के रंग और क्वालिटी। यहां करीब 125 प्रकार के अलग-अलग रंगों के ग्रेनाइट तैयार किए जाते हैं, जिनमें रोजी, चीमा, पी व्हाइट जैसे पत्थरों की बाजार में सबसे ज्यादा डिमांड है. इन पत्थरों की खास बात यह है कि ये पूरी तरह से प्राकृतिक रंगों से बने होते हैं, जिनकी चमक सालों तक बरकरार रहती है और समय के साथ फीकी नहीं पड़ती.

इसी को फैक्ट्री मैनेजर थान सिंह नरूका बताते हैं कि जालौर में रोजी और चीमा ग्रेनाइट की कटिंग सबसे ज्यादा होती है. यहां पत्थरों की कीमत करीब 40 रुपये प्रति स्क्वायर फीट से शुरू होकर 150 से 200 रुपये प्रति स्क्वायर फीट तक जाती है, जो उनकी क्वालिटी और फिनिशिंग पर निर्भर करती है. खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाला ग्रेनाइट पूरी तरह से नेचुरल कलर का होता है, जिसकी चमक लंबे समय तक बनी रहती है.

थान सिंह नरूका, फैक्ट्री मैनेजर लोकल18 को बताया 
यहा रोजी, चीमा और पी व्हाइट यहां सबसे ज्यादा कटते हैं। 40 रुपये से रेट शुरू होकर 150-200 रुपये स्क्वायर फीट तक पत्थर तैयार होता है। जालौर का ग्रेनाइट पूरी तरह नेचुरल कलर का है, इसकी चमक सालों तक रहती है, 10 साल बाद भी कोई फर्क नहीं आता। जबकि बाहर के मार्केट में कन्वर्ट कलर होता है, जो एक-दो साल में बदल जाता है और पत्थर खुरदरा हो जाता है।

जालौर के ग्रेनाइट की मजबूती और क्वालिटी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका उपयोग देश के बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स में भी किया जा रहा है. सरकारी बिल्डिंग्स, रेलवे स्टेशन और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में जालौर के पत्थर की भारी मांग है. इसके अलावा यह ग्रेनाइट भारत से बाहर भी कई देशों में निर्यात किया जा रहा है, जिससे जालौर का नाम वैश्विक स्तर पर भी चमक रहा है.

कुछ समय बाद अपनी चमक खो देते
यहां के पत्थरों की एक और खासियत यह है कि यह न तो जल्दी खराब होते हैं और न ही इनका रंग बदलता है. जहां दूसरे बाजारों में मिलने वाले पत्थर कुछ समय बाद अपनी चमक खो देते हैं और उनका रंग बदलने लगता है, वहीं जालौर का ग्रेनाइट सालों तक वैसा ही बना रहता है. यही कारण है कि ग्राहक इसे लंबे समय के लिए एक भरोसेमंद विकल्प मानते हैं.

करीब 1200 फैक्ट्रियों के साथ जालौर का ग्रेनाइट उद्योग हजारों लोगों को रोजगार भी दे रहा है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहा है.



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