Kerala Chunav: केरल में चुनावी बिगुल बज चुका है. यहां की राजनीति हमेशा से जाति और धर्म के संतुलन पर टिकी रही है, लेकिन इस बार चुनावी गणित में एक ऐसा ‘X फैक्टर’ उभर कर सामने आया है, जिसने सभी दलों की रणनीति को उलझा दिया है. करीब 18% ईसाई वोटर्स जो कभी एकजुट होकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते थे, अब अलग-अलग दिशाओं में बंटे नजर आ रहे हैं. यही बिखराव उन्हें और भी अहम बना देता है. क्योंकि अब हर सीट पर उनका असर अलग-अलग रूप में दिख सकता है. सवाल यह नहीं है कि ईसाई वोट किसके साथ है बल्कि यह है कि वह किस सीट पर किस हद तक असर डाल रहा है. यही अनिश्चितता राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.
न्यूज इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार दरअसल, पहले के दौर में ईसाई समुदाय को कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के रूप में देखा जाता था, लेकिन समय के साथ यह धारणा कमजोर हुई है. अब चर्च खुलकर किसी पार्टी का समर्थन नहीं करता और वोटर अपनी समझ से फैसला लेता है. इस बदलाव ने चुनावी तस्वीर को और जटिल बना दिया है. अलग-अलग चर्च, अलग-अलग क्षेत्र और अलग-अलग मुद्दे ये सभी मिलकर ऐसा समीकरण बना रहे हैं, जिसे समझना आसान नहीं है. यही वजह है कि इस बार केरल चुनाव में ‘X फैक्टर’ का जिक्र सबसे ज्यादा हो रहा है.
बंटा हुआ लेकिन असरदार: ईसाई वोट का नया गणित
केरल में ईसाई समुदाय भले ही संख्या में सीमित हो, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रभाव निर्णायक बना रहता है. हालांकि, यह समुदाय एकजुट नहीं है. कैथोलिक, मलांकारा, जैकोबाइट, ऑर्थोडॉक्स और पेंटेकोस्टल जैसे कई गुट हैं, जिनकी राजनीतिक सोच और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं. यही कारण है कि एक ‘यूनिफाइड क्रिश्चियन वोट’ अब बीते दौर की बात हो गई है.
केरल में ईसाई समुदाय भले ही संख्या में सीमित हो, लेकिन कई सीटों पर उसका प्रभाव निर्णायक बना रहता है. (फोटो PTI)
- फिर भी कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो पूरे समुदाय को जोड़ते हैं. पहाड़ी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष, आर्थिक चुनौतियां और जस्टिस जेबी कोशी आयोग की सिफारिशें आज भी अहम हैं. चर्च सीधे तौर पर किसी पार्टी को वोट देने की अपील नहीं करता, लेकिन यह जरूर कहता है कि ऐसे उम्मीदवार को चुनें जो समाज और चर्च के हित में काम करे. यही अप्रत्यक्ष प्रभाव कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है.
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब ईसाई वोट किसी एक पार्टी की झोली में नहीं जाता. कुछ इलाकों में यूडीएफ को बढ़त मिलती है, तो कहीं वामपंथी दल मजबूत दिखते हैं. वहीं भाजपा भी इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में हर सीट पर अलग-अलग समीकरण बन रहे हैं, जो चुनाव को और दिलचस्प बना रहे हैं.
केरल में ईसाई वोट इतना अहम क्यों है?
ईसाई समुदाय भले ही कुल आबादी का करीब 18% हो, लेकिन यह कई महत्वपूर्ण सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है. खासकर मध्य केरल के जिलों में, जहां उनकी संख्या ज्यादा है, वहां यह वोट किसी भी पार्टी की जीत-हार तय कर सकता है.
क्या ईसाई वोट अब भी एकजुट है?
नहीं, अब यह पूरी तरह एकजुट नहीं है. समुदाय कई धार्मिक और क्षेत्रीय गुटों में बंटा हुआ है. हर गुट की अपनी प्राथमिकताएं और राजनीतिक झुकाव हैं, जिससे एकजुट वोट बैंक की अवधारणा कमजोर हुई है.
चर्च की क्या भूमिका रहती है चुनाव में?
चर्च अब सीधे तौर पर किसी पार्टी का समर्थन नहीं करता. वह केवल सामाजिक मुद्दों और उम्मीदवार की प्रतिबद्धता पर जोर देता है. अंतिम फैसला वोटर पर ही छोड़ दिया जाता है, जिससे चुनावी व्यवहार और जटिल हो जाता है.
किन मुद्दों पर ईसाई वोट प्रभावित होता है?
मानव-वन्यजीव संघर्ष, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और जस्टिस जेबी कोशी आयोग की सिफारिशें जैसे मुद्दे अहम हैं. इन पर पार्टियों का रुख वोटिंग पैटर्न को प्रभावित करता है.
क्या भाजपा को ईसाई वोट में बढ़त मिल रही है?
कुछ इलाकों में भाजपा ने अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, लेकिन यह व्यापक स्तर पर अभी भी सीमित है. हालांकि, यह बदलाव भविष्य में बड़े राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर सकता है.
सीट-दर-सीट तय होगा ‘X फैक्टर’ का असर
इस बार केरल चुनाव में ईसाई वोट एक दिशा में नहीं जाएगा, बल्कि सीट-दर-सीट अपना असर दिखाएगा. यही वजह है कि राजनीतिक दल हर क्षेत्र में अलग रणनीति अपना रहे हैं. कहीं उम्मीदवार चयन पर जोर है, तो कहीं स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है. साफ है कि ‘X फैक्टर’ का यह खेल सीधा नहीं, बल्कि परतदार है और यही इसे इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू बनाता है.





