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इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि साल 1990 से 2020 के बीच एचकेएच यानी हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघले हैं. पिछले तीन दशकों में इनमें 12 फीसद कमी आई है. देहरादून के पर्यावरणविद अशीष गर्ग ने कहा कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया भर को सींचने का काम करते हैं, इसीलिए इन्हें वॉटर टावर कहा जाता है. उन्होंने कहा नदियों , झरनों जैसे जलस्त्रोत के माध्यम से हम तक पानी पहुंचाते हैं. अगर यह ऐसे ही पिघलते रहे तो भविष्य में संकट खड़ा हो सकता है.
देहरादून: नदियां और भूमिगत जल ग्लेशियर पर निर्भर करते हैं. वहीं हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र को तीसरा ध्रुव कहा जाता है, और यहां हो रहे बदलाव केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा हैं. इंटरनेशनल सेंटर फार इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि साल 1990 से 2020 के बीच एचकेएच यानी हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघले हैं. पिछले तीन दशकों में इनमें 12 फीसद कमी आई है.
अगर ग्लोबल वार्मिंग इसी तरह जारी रही, तो इस सदी के अंत तक हिमालय अपनी बर्फ का एक बड़ा हिस्सा खो देगा.पानी कम होगा, तो ऊपरी तटवर्ती देश पानी रोकने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे निचले देशों के साथ तनाव बढ़ेगा. ग्लेशियर का यूं पिघलकर पतला होना जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है.
दुनिया भर को सींचने का काम करते हैं ग्लेशियर
देहरादून के पर्यावरणविद अशीष गर्ग ने कहा कि हिमालय के ग्लेशियर दुनिया भर को सींचने का काम करते हैं, इसीलिए इन्हें वॉटर टावर कहा जाता है. उन्होंने कहा नदियों , झरनों जैसे जलस्त्रोत के माध्यम से हम तक पानी पहुंचाते हैं. अगर यह ऐसे ही पिघलते रहे तो भविष्य में संकट खड़ा हो सकता है. उन्होंने कहा ताजी रिपोर्ट तो डराने वाली है ही, इससे पहले भी कई रिपोर्टें आई है. उन्होंने कहा हमेशा यह बताया जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग के इफेक्ट से ग्लेशियर पिघलाकर पीछे खिसक रहे हैं, टूट रहे हैं. उन्होंने कहा कि गर्मियों के दिनों में जब तापमान ज्यादा हो जाता है.
ग्लेशियर ब्रस्ट लेता है आपदा का रूप
भारत में कई जगह पर भूमिगत जल नीचे चला जाता है तब पानी की किल्लत होती है और अगर जल स्रोतों को चार्ज करने वाले यह ग्लेशियर खत्म हो गए तो भविष्य में पीने का पानी नहीं मिल पाएगा और तभी कहा जाता है कि तीसरा वर्ल्ड वॉर पानी की वजह से होगा. उन्होंने कहा ग्लेशियर पिघलने के कई कारण हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में ग्लेशियर के हो रहे नुकसान हमने रैणी जैसी ग्लेशियर बर्स्ट के दौरान देखें कि किस तरह उसने आपदा का रूप लिया और कई मजदूरों की जान गई. दूसरी तरफ इसे आर्टिफिशियल लेक भी बन जाती है. हम धराली आपदा को भूल नहीं पाए हैं वहां कृत्रिम झील बनी, लद्दाख में ऐसी झील है जो कभी भी बड़ी आपदा ला सकती है. उन्होंने कहा यह है तो ग्लोबल प्रॉब्लम लेकिन हमारे राज्य और लोगों को धीरे-धीरे नुकसान दिखाती जा रही है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें





