वीकेंड पर क्यों करूं काम, सैलरी तो 5 दिन के ही देते हो ना! ऑफ वाले दिन काम के लिए बोला तो बॉस पर भड़का शख्स

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कॉर्पोरेट लाइफ लगातार हेक्टिक होते जा रहा है. वर्क-लाइफ बैलेंस करना मुश्किल हो जाता है. टारगेट, असाइनमेंट और प्रोजेक्ट के पूरा करने के बाद भी थोड़ा बहुत टाइम बच जाता है तो ऊपर से बॉस का वीकेंड पर थोड़ा-बहुत काम करने का आदेश. एम्प्लॉई के लिए, वीकेंड धीरे-धीरे नौकरी का एक हिस्सा बनता जा रहा है. जिसे पहले एक्स्ट्रा मेहनत के तौर पर देखा जाता था, अब अक्सर रोल का हिस्सा माना जाता है. Reddit पर एक यूजर ने अपनी आपबीती शेयर की है, जिस पर लोगों ने खूब बात की, वीकेंड पर काम करने की बढ़ती उम्मीद पर सवाल उठाया.

इंडियन वर्कप्लेस फोरम में शेयर की गई इस पोस्ट में एक बड़ी फर्म में हुई एक घटना के बारे में बताया गया है. यह एक बड़ा मुद्दा उठाया गया है कि कैसे एक्स्ट्रा काम के घंटों को रूटीन के तौर पर स्वीकार किया जा रहा है.

पोस्ट में यूजर ने बताया सब

एक यूजर ने हाल ही में बिग फोर फर्म को ज्वाइन किया था. पोस्ट में बताया गया कि उनके मैनेजर ने यह साफ कर दिया था कि क्लाइंट की मांगों के लिए उन्हें आम पांच-दिन के शेड्यूल से ज्यादा काम करना होगा. उसके बाद यूजर ने बताया, ‘मैंने हाल ही में बिग फोर जॉइन किया और मुझे एक प्रोजेक्ट दिया गया, जहां मेरे मैनेजर ने कल साफ-साफ कहा कि क्लाइंट हमारे लिए जरूरी है इसलिए डेडलाइन पूरी करने के लिए आपको वीकेंड पर काम करना होगा. उन्होंने साफ-साफ हमें वीकेंड पर काम करने का ऑर्डर दिया. और कहा कि आपसे पहले वाले भी ऐसा करते थे.’

फिर दिया जवाब

सहमत होने के बजाय एम्प्लॉई ने मंह पर जवाब दिया. उन्होंने अपनी बात समझाते हुए कहा, ‘मैंने इज्जत से कहा कि मैं वीकेंड पर काम नहीं कर सकता क्योंकि मुझे 5 दिन की पेमेंट मिलती है और 2 दिन मुझे अपने लिए भी चाहिए.’ उनके मैनेजर ने जवाब दिया, ‘यहां हर कोई वीकेंड पर काम करता है, आपको यह करना होगा.’ जब एम्प्लॉई ने अपना स्टैंड बदलने से मना कर दिया तो मामला जल्द ही बिगड़ गया. उन्होंने लिखा, ‘मैंने कहा कि आप मुझे इस प्रोजेक्ट से हटा सकते हैं. इसके बाद वे बहुत गुस्सा हो गए. उन्होंने इस बारे में सीनियर मैनेजमेंट को बता दिया है.’

घर में क्लाइंट की तस्वीर लगाओ

यूजर लिखा कि लिखा, ‘हम भारतीयों ने वीकेंड पर काम करने को इतना क्यों बढ़ा-चढ़ाकर बताया है? मेरा मतलब है, ये सभी मैनेजर, आप अपने घर में क्लाइंट की तस्वीर क्यों नहीं लगाते और अपनी पत्नी और बच्चों से हर दिन उसकी पूजा क्यों नहीं करवाते?’ पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा था. कई यूजर्स अपने अनुभव शेयर किए. कई लोगों ने बाउंड्री तय करने के लिए एम्प्लॉई का सपोर्ट किया.

ऐसे ही बदलाव शुरू होता

एक यूजर ने रिएक्ट किया, ‘बदलाव आप जैसे लोगों से शुरू होता है. शाबाश!’ दूसरे ने लिखा, ‘भाई, अपनी बात पर अड़े रहो. यह हमारी पीढ़ी के साथ खत्म होता है. हमें एक जिंदगी और शौक चाहिए, इसमें कोई हैरानी नहीं कि भारतीय हमेशा फ्रस्ट्रेट रहते हैं और काम और भगवान के अलावा उनकी कोई पर्सनैलिटी नहीं होती.’

ना कहना बहुत जरूरी होता है

कई लोगों ने जॉब मार्केट की असलियत बताई. यहां ना कहना हमेशा आसान नहीं होता. एक यूजर ने लिखा, ‘इंडिया एम्प्लॉयर का मार्केट है. हमेशा कोई न कोई हां कहने को तैयार रहता है. इसलिए यह सही या गलत की बात नहीं है. मैनेजर इसलिए ज़ोर देते हैं क्योंकि वे ऐसा कर सकते हैं, और यह उनके लिए पहले भी काम कर चुका है. सिर्फ एक चीज़ जो इसे बदलती है, वह है लोगों के लिए एक बाउंडरी लाइन खिंचना.

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर शेयर किए गए यूज़र-जनरेटेड कंटेंट पर आधारित है. न्यूज18 हिंदी ने खुद से दावों को वेरिफाई नहीं किया है और न ही उनका समर्थन करता है.



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