ईरान जंग के बाद किसानों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि खाद मिलेगी या नहीं? सरकार के पास अभी कितनी खाद मौजूद है? धान की बुआई में दिक्कत तो नहीं आएगी? अगर खाद कम पड़ गई तो कहां से आएगी? सरकार ने क्या इंतजाम किए हैं? इन सब सवालों के जवाब रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने दिए हैं.
भारत को कितनी खाद की है जरूरत?
भारत में गर्मियों की फसल का सीजन अप्रैल से शुरू हो जाता है. रसायन और उर्वरक मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव अपर्णा शर्मा के मुताबिक, इस आगामी फसल सीजन के लिए देश को कुल 39 मिलियन मीट्रिक टन यानी 3.9 करोड़ टन खाद की आवश्यकता होगी.
देश में अभी कितना स्टॉक मौजूद है?
किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सरकार के पास सुरक्षित भंडार मौजूद है. भारत के पास इस वक्त लगभग 18 मिलियन मीट्रिक टन खाद का स्टॉक है. राहत की बात यह है कि पिछले साल इसी समय यह स्टॉक केवल 14.7 मिलियन टन था.
ज्यादा परेशानी की बात क्यों नहीं?
सरकार का मानन है कि अप्रैल और मई के महीनों में खाद की खपत थोड़ी कम होती है, इसलिए सरकार इस लीन पीरियड का इस्तेमाल अपना स्टॉक और ज्यादा बढ़ाने के लिए करती है. सरकार इस समय में बड़ी मात्रा में खरीद बढ़ाने की तैयारी में है.
भारत में खाद का कितना उत्पादन होता है?
वर्तमान में देश के अंदर हर महीने 1.8 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन हो रहा है. आम तौर पर यह 2.4 मिलियन टन होता है, लेकिन कुछ प्रमुख प्लांट अपने सालाना मेंटेनेंस के बाद अभी दोबारा चालू हो रहे हैं, जिससे उत्पादन जल्द ही रफ्तार पकड़ लेगा. उसके बाद उत्पादन तेजी से बढ़ेगा.
खाड़ी देशों पर भारत की कितनी निर्भरता?
युद्ध से पहले भारत अपने यूरिया आयात का 20% से 30% और डीएपी (DAP) का 30% हिस्सा खाड़ी देशों से खरीदता था. खाद बनाने के लिए सबसे जरूरी कच्चा माल ‘तरलीकृत प्राकृतिक गैस’ (LNG) होता है, जिसका 50% आयात भारत मध्य पूर्व से ही करता है. युद्ध के कारण ग्लोबल मार्केट में खाद की कीमतें और माल ढुलाई का खर्च काफी बढ़ गया है.
कम पड़ा तो कहां से आएगा, सरकार का प्लान-B क्या है?
भारत अब केवल खाड़ी देशों के भरोसे नहीं है. रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों से खाद मंगाने के लिए सप्लाई बेस तैयार कर लिया गया है.
रूस हमें कितनी मदद कर रहा है?
भारतीय खाद कंपनियों ने मिडिल ईस्ट का विकल्प तलाशते हुए कई लॉग टर्म समझौते किए हैं. इसमें केप ऑफ गुड होप यानी अफ्रीका के नीचे का समुद्री रास्ता, उसके जरिए रूस से 2.8 मिलियन टन खाद मंगाने की एक बहुत बड़ी डील शामिल है.
सरकार ने कितना दिया ऑर्डर
कमी से बचने के लिए सरकार ने फरवरी के मध्य में ही अतिरिक्त 1.3 मिलियन टन यूरिया मंगाने के लिए एक ग्लोबल टेंडर जारी कर दिया था. जब यह पहुंचेगा, तब भारत में खाद की उपलब्धता काफी ज्यादा होगी.
किसानों की जेब पर क्या होगा असर?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल, माल ढुलाई और खाद की कीमतें भले ही आसमान छू रही हों, लेकिन इसका बोझ किसानों पर नहीं पड़ेगा. केंद्र सरकार ने साफ किया है कि वह यूरिया और डीएपी (DAP) को पहले की तरह भारी सब्सिडी वाली दरों पर ही बेचना जारी रखेगी.





