पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले देशभर में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों का अपने घर लौटने का सिलसिला तेज हो गया है. मतदान में हिस्सा लेने के लिए हजारों मजदूर अलग-अलग राज्यों से बंगाल की ओर रवाना हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल के अलावा असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी इसी महीने चुनाव होने हैं, जिससे ट्रेनों में टिकट की खूब मारा-मारी दिख रही है.
पश्चिम एशिया में चल रही जंग से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने हालात को और मुश्किल बना दिया है. रेलवे ने ईंधन बचाने के लिए ट्रेनों की संख्या सीमित कर दी है, जिससे टिकटों की कीमतों में भारी उछाल आया है. इसके बावजूद प्रवासी मजदूर वोट डालने के लिए घर जाने को बेताब नजर आ रहे हैं. उन्हें डर है कि अगर वे वोट नहीं डालेंगे तो उनका नाम मतदाता सूची से कट सकता है. यह डर हाल ही में कई राज्यों में किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के कारण और बढ़ गया है.
जनरल डिब्बों में सफर को मजबूर मजदूर
मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर भी बंगाल के प्रवासी मजदूरों की खूब भीड़ दिख रही है. ऐसे ही एक मजदूर शिकायती लहजे में कहते हैं कि चुनाव के समय अतिरिक्त ट्रेनों की व्यवस्था नहीं की गई है. कई लोग लंबी वेटिंग लिस्ट के कारण मजबूरन जनरल डिब्बों में यात्रा कर रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुमोध और सूरज दास नाम के दो भाइयों ने बताया कि उनकी वेटिंग 100 से ऊपर चली गई थी, जिसके बाद उन्हें जनरल टिकट लेकर सफर करना पड़ा.
पूर्वी बर्धमान के रहने वाले निर्माण मजदूर जयंतो बागड़ी सवाल उठाते हैं कि सरकार ने कोविड-19 लॉकडाउन की तरह विशेष ट्रेनें क्यों नहीं चलाईं. वहीं बंगाल स्वर्ण शिल्प कल्याण संघ के महासचिव कालिदास सिन्हा रॉय ने कहा कि हजारों प्रवासी मजदूर वोट डालने के लिए लौटना चाहते हैं, लेकिन सीमित परिवहन व्यवस्था के कारण उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि रेलवे मंत्रालय से अतिरिक्त ट्रेनों की मांग की गई थी, लेकिन पूरे देश में सिर्फ 24 स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं, जो पर्याप्त नहीं हैं. मुंबई से रोजाना सात ट्रेनें बंगाल जाती हैं, लेकिन वे भी जरूरत के मुकाबले कम हैं. कई लोग अब एसी बसों का सहारा ले रहे हैं.
ऑल इंडिया श्रमिक स्वराज केंद्र के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलीमुल्लाह के मुताबिक, अकेले कर्नाटक में ही तीन लाख से ज्यादा बंगाली प्रवासी मजदूर इस समस्या से प्रभावित हैं. उन्होंने मांग की है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनें और स्लीपर बसें तुरंत चलाई जाएं. अहमदाबाद में भी इसी तरह की स्थिति है, जहां समाजिक संगठनों को मजदूरों के लिए बसों की व्यवस्था करनी पड़ रही है.
SIR ने बढ़ाया डर
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) इस बार प्रवासी मजदूरों के लौटने की बड़ी वजह बनकर सामने आया है. कई मजदूरों को डर है कि मतदान नहीं करने पर उनका नाम मतदाता सूची से हट सकता है. पिछले साल ऐसे मामले सामने आए थे, जहां कुछ लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए थे और कुछ को अवैध प्रवासी समझकर बांग्लादेश तक भेज दिया गया था.
इस स्थिति के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘श्रमश्री’ योजना की घोषणा की थी, जिसके तहत लौटने वाले प्रवासी परिवारों को एक साल तक हर महीने 5,000 रुपये देने का प्रावधान किया गया है. पुणे में काम करने वाले बैंककर्मी शिबायन सेठ ने बताया कि उनका नाम कुछ समय के लिए वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था, इसलिए इस बार वे हर हाल में वोट डालना चाहते हैं. वहीं रेस्टोरेंट में काम करने वाले रॉबिन हांडोल का कहना है कि उनके लिए यह सिर्फ वोट नहीं, बल्कि भविष्य में नागरिकता से जुड़े किसी भी विवाद से बचने का जरिया है.
‘वोटर लिस्ट से कट गया आधे परिवार का नाम’
बेंगलुरु में रहने वाले मजदूरों ने बताया कि कई परिवारों में आधे लोगों के नाम ही मतदाता सूची में बचे हैं, जिससे डर और बढ़ गया है. दक्षिण दिल्ली में भी बड़ी संख्या में बंगाली प्रवासी परिवार रहते हैं, जिनमें से कई के नाम SIR प्रक्रिया के दौरान हटा दिए गए, जिससे वे अब हर हाल में वोट डालने के लिए घर लौटना चाहते हैं.
आर्थिक दबाव भी इस समस्या को और बढ़ा रहा है. सूरत में काम करने वाले मेदिनीपुर के बिस्वजीत खातुआ ने बताया कि डायमंड ज्वेलरी उद्योग में मंदी के कारण आमदनी घटी है और महंगे टिकट खरीदना मुश्किल हो गया है. वहीं पंजाब के कृषि क्षेत्रों में भी मजदूरों की कमी देखी जा रही है, क्योंकि कई मजदूर वोट डालने के लिए घर लौट गए हैं, जिससे फसल कटाई प्रभावित हुई है.
देशभर में फैले 24 लाख बंगाली मजदूर
2011 की जनगणना के अनुसार, देशभर में बंगाल के करीब 24 लाख प्रवासी मजदूर हैं. इनमें झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार प्रमुख गंतव्य हैं. रेलवे इन मजदूरों के आवागमन का मुख्य साधन है, लेकिन भारी संख्या के कारण पूरे साल टिकट मिलना मुश्किल रहता है.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होंगे, जबकि मतगणना 4 मई को होगी. ऐसे में लाखों प्रवासी मजदूर हर हाल में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए घर लौटने की कोशिश में जुटे हुए हैं, भले ही इसके लिए उन्हें महंगा और कठिन सफर क्यों न करना पड़े.





