इन दिनों बांग्लादेश में यूनुस के चहते “आसिफ महमूद शोजिब भुइयां” फिर चर्चा में है. आसिफ छात्र आंदोलन के प्रमुख समन्वयकों में से एक थे. वह जून 2024 में आरक्षण के खिलाफ चल रहे देशव्यापी छात्र आंदोलन से जुड़े थे. आसिफ महमूद बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में युवा और खेल मंत्रालय (Youth and Sports Adviser) के सलाहकार बने. मुहम्मद यूनुस के बहुत करीबी सहयोगी रहे आसिफ महमूद शोजिब भुइयां ने अब एक बहुत बड़ा और विस्फोटक खुलासा किया है.
उन्होंने दावा किया है कि शेख हसीना को 5 अगस्त 2024 को सत्ता से हटाने के बाद ‘डीप स्टेट’, यूनुस को कम से कम 2029 तक सत्ता में बनाए रखने की पूरी साजिश रची थी. 26 दिसंबर को National Citizen Party (NCP) के केंद्रीय कार्यालय में हुई एक चर्चा बैठक के दौरान, जो कि मोहम्मद यूनुस और उनके सहयोगियों के समर्थन से बनी एक राजनीतिक पार्टी है, आसिफ महमूद शोजिब भुइयां ने एक चौंकाने वाला दावा किया.
उन्होंने कहा, “जब हम सरकार में थे, शुरुआती दिनों में हमें शक्तिशाली संस्थाओं से प्रस्ताव मिले जिन्हें आमतौर पर ‘डीप स्टेट’ कहा जाता है. उन्होंने सुझाव दिया कि हम शेख हसीना के बचे हुए कार्यकाल (जो 2029 तक है) को पूरा करें, और इसके बदले वे हमें पूरा समर्थन देंगे.”
भुइयां ने आगे बताया कि इन लोगों की “कुछ खास मांगें” भी थीं, जिनमें कुछ क्षेत्रों में उनके हितों को आगे बढ़ाना शामिल था. उन्होंने कहा, “उन्होंने एक पूरा रोडमैप भी तैयार कर लिया था. उनका तर्क था कि Bangladesh Nationalist Party (BNP) के नेताओं के खिलाफ पहले से सजा (conviction) है, और अगर ये सजा बनी रहती है, तो वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. इन मामलों को अदालत में लंबा खींचा जा सकता है, आप जानते हैं यह कैसे होता है, बार-बार सुनवाई की तारीख टालकर.”
उन्होंने यह भी कहा कि तारिक रहमान खुद भी दोषी ठहराए जा चुके हैं, और अगर उनकी सजा बनी रहती, तो चुनाव होने के बावजूद वे चुनाव नहीं लड़ सकते थे. आसिफ महमूद ने यह भी दावा किया कि सत्ता में बने रहने की पूरी रणनीति तैयार की गई थी. उन्होंने कहा, “इसे एक तरह की बातचीत या समझौते के रूप में पेश किया गया था. लेकिन हमने इसे स्वीकार नहीं किया. हमने हमेशा लोकतंत्र को प्राथमिकता दी, और हमारी प्रतिबद्धता के कारण ही चुनाव कराए गए. बल्कि, यह सुनिश्चित करने के लिए कि चुनाव पर कोई सवाल न उठे, हमने स्वेच्छा से सत्ता भी छोड़ दी.”
अगर ये दावा सही साबित होता है, तो यह सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि एक बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष की तस्वीर सामने लाएगा. विदेशी खुफिया एजेंसियों की संभावित भूमिका, कट्टरपंथ और राजनीति को प्रभावित करने की कोशिशें, ये सब मिलकर बांग्लादेश की संप्रभुता, लोकतंत्र और क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
अब देखना यह है कि इन खुलासों की गहराई से जांच होती है या इन्हें सिर्फ राजनीतिक बयान मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन इतना तय है कि इसका असर सिर्फ बांग्लादेश तक सीमित नहीं रहेगा, अगर ये सच निकला, तो दक्षिण एशिया में ताकत, प्रभाव और पर्दे के पीछे चलने वाली राजनीति को दुनिया नए नजरिए से देखेगी.





