Last Updated:
Patna Dog Lover Story: साइबेरियन हस्की ब्रीड का हंटर फिलहाल करीब 3 साल का है और बेहद फ्रेंडली नेचर का डॉग है. इसे अकेले रहना बिल्कुल भी पसंद नहीं है. आर.के. झा के बेटे ने इसे महज 30 दिन की उम्र में पटना से खरीदकर घर लाया था. इसका वजन लगभग 25 किलो है.
मौत के मुंह से वापस खींच लाने के लिए चार लाख रुपये तक खर्च कर दिए. यह कहानी है आरके झा और उनके पालतू डॉग “हंटर” की. यह डॉग सिर्फ एक जानवर नहीं बल्कि इनके परिवार का हिस्सा है. महज 30 दिन की उम्र में हंटर उनके घर आया था. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 8 महीने का होते-होते उसे फुल बॉडी पैरालिसिस ने जकड़ लिया. हालत इतनी गंभीर हो गई कि उसके पूरे शरीर के बाल झड़ गए और आवाज तक चली गई.
पटना से लेकर चंडीगढ़ तक इलाज के लिए दौड़ भाग हुई. कई डॉक्टरों से सलाह ली गई, लंबा इलाज चला और करीब चार लाख रुपये खर्च हुए. हालात ऐसे थे कि उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन आरके झा ने हार नहीं मानी. दिलचस्प बात यह है कि कभी कुत्तों से दूरी बनाने वाले आरके झा आज हंटर को बेटे की तरह चाहते हैं.
30 दिन की उम्र में लेकर आए थे घर
साइबेरियन हस्की ब्रीड का हंटर फिलहाल करीब 3 साल का है और बेहद फ्रेंडली नेचर का डॉग है. इसे अकेले रहना बिल्कुल भी पसंद नहीं है. आर.के. झा के बेटे ने इसे महज 30 दिन की उम्र में पटना से खरीदकर घर लाया था. इसका वजन लगभग 25 किलो है. आरके. झा की पत्नी को डॉग बिल्कुल पसंद नहीं थे, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि हंटर के बिना उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता.
खाने का है शौकीन, अलार्म का करता है काम
हंटर खाने-पीने के मामले में काफी शौकीन है. वह किसी भी खाने को लगातार दो दिन तक नहीं खाता. उसे चिकन, मटन और मछली सब पसंद हैं, लेकिन एक ही चीज बार-बार खाना उसे पसंद नहीं है. दही-चावल उसका बेहद पसंदीदा भोजन है.आर.के. झा बताते हैं कि हंटर उनके परिवार के लिए किसी अलार्म से कम नहीं है. वह रोज सुबह करीब साढ़े पांच बजे हर कमरे में जाकर सबको जगा देता है और उसके बाद खुद आराम से सो जाता है. खास बात यह है कि वह रात भर सोता भी नहीं है. इसीलिए जब सब जग जाते हैं तब खुद सोता है.
फुल बॉडी हो गया था पैरालिसिस
जब हंटर 8 महीने का हुआ, तो फुल बॉडी पैरालिसिस का शिकार हो गया. उसकी आवाज पूरी तरह बंद हो गई थी. वह बिल्कुल बोल और चल नहीं पा रहा था. पटना के वेटरनरी अस्पताल में उसका इलाज शुरू हुआ. धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार आया और अब वह सामान्य हो चुका है. पटना से लेकर चंडीगढ़ तक करीब 6 महीने तक उसका इलाज चला. पटना में फिजियोथेरेपी की व्यवस्था नहीं होने के कारण उसे चंडीगढ़ ले जाया गया, जहां नियमित फिजियोथेरेपी करवाई गई. इस पूरे इलाज में लगभग 4 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हुए.
इस पर आरके. झा बताते हैं कि जब वह अपने डॉग के इलाज के लिए अस्पताल आते थे, तो वहां कई अन्य पेट लवर्स भी मिलते थे. एक दिन उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति को डॉक्टर ने इलाज का खर्च 7-8 हजार रुपये बताया, तो वह अपना डॉग वहीं छोड़कर चला गया. यह देखकर उनका दिल टूट गया. उसी दिन उन्होंने ठान लिया कि चाहे जितना भी खर्च हो, वह अपने ‘बेटे’ को इस हालत में कभी नहीं छोड़ेंगे.





