नई दिल्ली: देश की फैमिली कोर्ट्स की कार्यप्रणाली और जजों की निष्पक्षता को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में इस बात पर गंभीर चिंता जताई गई है कि क्या वही जज किसी मामले का फैसला सुना सकता है जिसने पहले उसी केस में इन-चेम्बर मध्यस्थता की कोशिश की हो. सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड प्रीति सिंह द्वारा दायर इस याचिका ने न्यायपालिका के सामने एक मौलिक प्रश्न रखा है कि क्या एक जज, जो मध्यस्थता के दौरान गोपनीय बातों और व्यक्तिगत खुलासों को जान चुका है, बाद में उसी विवाद पर निष्पक्ष फैसला दे सकता है?
क्या है पूरा विवाद?
अकसर फैमिली कोर्ट्स में जज आपसी सुलह कराने के लिए चैम्बर के अंदर अनौपचारिक बातचीत करते हैं. याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रक्रिया के दौरान जज को पक्षकारों की उन गोपनीय बातों, समझौतों की शर्तों और निजी जानकारियों का पता चल जाता है जो कानूनी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं होतीं. यदि मध्यस्थता विफल हो जाती है तो वही जज उसी मामले की मेरिट पर सुनवाई करता है. याचिका के अनुसार यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और जजों की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है.
कानूनी दलीलें और सुप्रीम कोर्ट के मिसाल
प्रीति सिंह ने अपने प्रतिवेदन में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं का हवाला दिया है:
· धारा 89 (CPC): यह कानून कोर्ट को विवाद सुलझाने के लिए केवल वैकल्पिक तंत्र (ADR) के पास भेजने का अधिकार देता है, न कि खुद मध्यस्थ बनने का.
· मध्यस्थता अधिनियम, 2023: यह स्पष्ट करता है कि मध्यस्थता एक स्वतंत्र और तटस्थ व्यक्ति द्वारा की जानी चाहिए.
· एफकॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर केस: सुप्रीम कोर्ट ने इस लैंडमार्क जजमेंट में स्पष्ट किया था कि जजों को उन मामलों का फैसला करने से बचना चाहिए जिनमें उन्होंने खुद समझौता कराने की कोशिश की हो.
याचिका में उठाई गई मुख्य चिंताएं
1. अचेतन प्रभाव: गोपनीय जानकारी जज के न्यायिक निर्णय को अनजाने में प्रभावित कर सकती है.
2. डर का माहौल: पक्षकारों को डर लग सकता है कि मध्यस्थता के दौरान कही गई बात अंतिम फैसले को बिगाड़ सकती है.
3. समझौते का दबाव: जज के पद और प्रभाव के कारण वादी-प्रतिवादी खुद को समझौता करने के लिए मजबूर महसूस कर सकते हैं.
मांगी गई नई गाइडलाइंस
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट की कमेटी से मांग की है कि फैमिली कोर्ट्स के लिए सख्त नियम बनाए जाएं:
· पीठासीन जजों को लंबित मामलों में खुद मध्यस्थता करने से रोका जाए.
· मामलों को अनिवार्य रूप से कोर्ट-एनेक्स्ड मेडिएशन सेंटर या स्वतंत्र मध्यस्थों के पास भेजा जाए.
· यदि किसी जज ने सुलह की कोशिश की है तो वह केस किसी दूसरे जज को ट्रांसफर किया जाए.
यह मामला पारिवारिक विवादों, जैसे बच्चे की कस्टडी और घरेलू हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दों में न्याय की शुचिता बनाए रखने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अब सबकी नजरें दिल्ली हाई कोर्ट की जजों की कमेटी पर हैं कि वह इस पर क्या दिशा-निर्देश जारी करती है.





