ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर चुप्पी क्यों? 193 सांसदों के नोटिस को सरकार ने किया इग्नोर! TMC सांसद ने पूछे सवाल

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ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पर चुप्पी क्यों? TMC सांसद का सरकार से सवाल

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टीएमसी ने अपने दावों को साबित करने के लिए कई पुराने उदाहण दिए हैं. पार्टी ने बताया कि 1991 में जस्टिस वी रामास्वामी को हटाने का नोटिस तुरंत मान लिया गया था. 2009 में जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस पीडी दिनाकरन के मामले में भी ऐसा ही फास्ट एक्शन हुआ था.

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ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव पर टीएमसी ने केंद्र पर निशाना साधा. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली. तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ’ब्रायन ने संसद में विपक्षी नेताओं द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव की मांग वाले नोटिस पर ‘चुप्पी’ पर बृहस्पतिवार को सवाल उठाया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निर्वाचन आयोग के साथ ‘गुप्त सांठगांठ’ का आरोप लगाते हुए इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया.

इस नोटिस में विपक्षी सांसदों (लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63) ने कुमार पर ‘कार्यपालिका के इशारे पर काम करने’ और एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से ‘बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करने’ का आरोप लगाया है. इस नोटिस में कुमार की सीईसी के रूप में नियुक्ति पर भी सवाल उठाए गए हैं.

नोटिस 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों में सौंपा गया था, लेकिन उस पर सचिचालयों से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. ओ’ब्रायन ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, “मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए 193 सांसदों द्वारा दिए गए नोटिस को नजरअंदाज किया गया. अब ये चुनावी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं.”

तृणमूल सांसद ने मीडिया से कहा, “विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने के वास्ते नोटिस भेजा था, लेकिन इस पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.” उन्होंने कहा, “हम तो कहते आ रहे हैं कि भाजपा और निर्वाचन आयोग के बीच गुप्त सांठगांठ है. अब यह साफ हो गया है कि यह दिनदहाड़े ‘मैच फिक्सिंग’ है.”

तृणमूल ने कुछ पुराने उदाहरणों का भी हवाला दिया. उसने कहा कि वर्ष 1991 में जस्टिस वी रामास्वामी को हटाने का प्रस्ताव 12 मार्च को स्वीकार किया गया था और उसी दिन एक जांच समिति का गठन किया गया था. तृणमूल ने कहा कि 2009 में राज्यसभा सदस्यों ने 20 फरवरी को जस्टिस सौमित्र सेन को हटाने की मांग वाला एक नोटिस पेश किया था, जिसे 27 फरवरी को स्वीकार कर लिया गया था. उसने कहा कि इसी तरह 2009 में जस्टिस पीडी दिनाकरन को हटाने की मांग वाला एक नोटिस 14 दिसंबर को पेश किया गया था, जिसे 17 दिसंबर को स्वीकार कर लिया गया था.

पार्टी ने कहा कि 2018 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा को हटाने की मांग वाला एक नोटिस 20 अप्रैल को राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया था, जिसे तत्कालीन सभापति एम वेंकैया नायडू ने 23 अप्रैल को खारिज कर दिया था. ओ’ब्रायन ने कहा, “सरकार संसद का मखौल उड़ा रही है, जबकि वह हमें उपदेश देती है. वास्तविकता यह है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने संसद के हृदय में खंजर घोंपकर संसदीय लोकतंत्र की हत्या कर दी है.” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से महिलाओं को सशक्त बनाने वाले कानूनों के बारे में सीख ले सकते हैं.

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Rakesh Ranjan Kumar

राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें



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