नई दिल्ली (Rakesh B Pal Auto Driver Inspiring Story). आज के दौर में जहां एआई के आने से कॉर्पोरेट जगत में छंटनी का डर बना हुआ है और लाखों युवा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, वहीं बेंगलुरु के राकेश बी पाल की कहानी नई रोशनी दिखाती है. जिस ऐपल (Apple) जैसी ग्लोबल कंपनी में काम करने का सपना दुनिया देखती है, राकेश ने उस चमक-धमक और मोटी तनख्वाह को ठोकर मार दी. यह फैसला किसी जल्दबाजी में नहीं, बल्कि खुद को तलाशने और मानसिक गुलामी से आजाद होने के लिए लिया गया था.
राकेश बी पाल का सफर ऐपल से शुरू होकर बैंक और टॉप टेक कंपनियों तक पहुंचा. लेकिन इस ऊंचाई पर पहुंचकर उन्हें मिला तो सिर्फ डिप्रेशन और मैनिपुलेशन का जाल. एक समय वे भारी दवाइयों के सहारे जी रहे थे, खुद को घर में कैद कर लिया था. लेकिन आज वही राकेश बेंगलुरु की सड़कों पर गर्व से इलेक्ट्रिक ऑटो चला रहे हैं, मार्शल आर्ट्स में मेडल जीत रहे हैं और खुलकर जिंदगी जी रहे हैं. उनकी डाउनशिफ्टिंग की कहानी साबित करती है कि असल कामयाबी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जीने में है.
कॉर्पोरेट की झूठी चमक और People Pleasure बनने का दर्द
राकेश बी पाल बताते हैं कि ऐपल और बड़े बैंक में काम करते हुए शुरुआत में सब कुछ जादुई लगा, लेकिन जल्द ही हकीकत सामने आ गई. कॉर्पोरेट दुनिया में लोग अक्सर एक-दूसरे को नीचा दिखाने और निजी स्वार्थ के जाल में फंसे रहते हैं. राकेश बी पाल ने अपना सफर सोशल मीडिया पर भी शेयर किया. वे कहते हैं, मैं सबको खुश करने की कोशिश में (People Pleaser) खुद को ही भूल गया था. मेरे पास सारी सुविधाएं थीं, लेकिन मन की खुशी गायब थी. इसी घुटन ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया.
डिप्रेशन से जंग: जब दवाइयों के सहारे कटती थी रातें
बचपन के कड़वे अनुभवों और शादीशुदा जिंदगी की नाकामियों ने राकेश बी पाल को डिप्रेशन के गहरे अंधेरे में धकेल दिया. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि उन्हें NIMHANS और विक्टोरिया अस्पताल में लंबा इलाज कराना पड़ा. राकेश बी पाल उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि वे घंटों एक ही ख्याल में डूबे रहते थे और एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयों के बिना उनका गुजारा मुश्किल था. उस वक्त उन्हें लगा कि शायद उनकी जिंदगी अब यहीं खत्म हो जाएगी.
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मार्शल आर्ट्स और अनुशासन से मिली ‘मानसिक मुक्ति’
दवाइयों पर निर्भर रहने के बजाय राकेश बी पाल ने खुद को बदलने का फैसला किया. उन्होंने मनोविज्ञान और ‘डार्क ट्रायड’ (नार्सिसिज्म और साइकोपैथी) जैसे विषय पढ़े, जिससे वे समझ सकें कि उनके साथ क्या हो रहा है. उन्होंने इंटरमिटेंट फास्टिंग से 15 किलो वजन घटाया और अपने बचपन के शौक ‘मुवा थाई’ और ‘जू-जित्सू’ की तरफ लौटे. उनकी मेहनत का ही नतीजा था कि उन्होंने स्टेट लेवल मार्शल आर्ट्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल अपने नाम किया.
फूड डिलीवरी से ऑटो ड्राइवर तक: कोई काम छोटा नहीं
कॉर्पोरेट की आरामदायक कुर्सी छोड़ने के बाद राकेश बी पाल ने सर्वाइवल के लिए हर छोटा-बड़ा काम किया. उन्होंने फूड डिलीवरी बॉय, बाइक टैक्सी ड्राइवर और यहां तक कि जिम सहायक के रूप में भी काम किया. राकेश का मानना है कि ये छोटे-छोटे काम ही उन्हें उनकी असली पहचान के करीब लाए. 4 साल के कड़े संघर्ष के बाद वे बेंगलुरु में गर्व के साथ इलेक्ट्रिक ऑटो चलाते हैं.
अच्छी सीख देती है राकेश की जिंदगी
आज राकेश बी पाल केवल एक ऑटो ड्राइवर नहीं हैं. वे डांसर हैं, पेंटर हैं और सबसे बड़ी बात – एक स्वतंत्र इंसान हैं. वे कहते हैं, अब मुझे किसी को खुश करने की जरूरत नहीं है. ऑटो चलाने के साथ-साथ वे डांस क्लासेस भी लेते हैं. उनकी कहानी सिखाती है कि अगर आपमें हिम्मत है तो आप शून्य से शुरू करके भी ऐसा जीवन बना सकते हैं, जिसमें न तनाव हो और न ही किसी की गुलामी करने की मजबूरी.




