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गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक ने बताया कि लाल सड़न रोग से बचाव के लिए किसानों को बुवाई के समय ही विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. किसानों को उन किस्मों का चयन करना चाहिए जो इस रोग के प्रति प्रतिरोधी हों. इसके अलावा, बीज और मृदा उपचार बेहद जरूरी है. बीज उपचार के लिए थायोफिनेट मिथाइल या कार्बेन्डाजिम (0.1%) का उपयोग करें.
शाहजहांपुर: गन्ने की खेती में लाल सड़न रोग (Red Rot) किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है. इससे फसल को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने ऐसी किस्में विकसित की हैं जो इस रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं. गन्ने की बसंत कालीन बुवाई का वर्तमान समय बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए एक्सपर्ट की सलाह है कि किसान मुख्य रूप से को.शा. 18231, को.शा. 19231 और को.शा. 13235 जैसी लाल सड़न रोधी किस्मों की ही बुवाई करें. इन किस्मों की बुवाई न केवल फसल को रोगमुक्त रखेगी, बल्कि बेहतर पैदावार सुनिश्चित कर किसानों की आय में भी इजाफा होगा.
बुवाई के समय बरतें सावधानी
गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक ने बताया कि लाल सड़न रोग से बचाव के लिए किसानों को बुवाई के समय ही विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. किसानों को उन किस्मों का चयन करना चाहिए जो इस रोग के प्रति प्रतिरोधी हों. इसके अलावा, बीज और मृदा उपचार बेहद जरूरी है. बीज उपचार के लिए थायोफिनेट मिथाइल या कार्बेन्डाजिम (0.1%) का उपयोग करें. वहीं मिट्टी के उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा को सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर खेत की तैयारी के समय इस्तेमाल करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर किसान इन वैज्ञानिक विधियों को अपनाते हैं, तो गन्ने को लाल सड़न रोग से पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सकता है.
बीज और मिट्टी के उपचार की तकनीक
गन्ने की स्वस्थ फसल के लिए वैज्ञानिक तरीके से बीज और मिट्टी का उपचार करना बेहद जरूरी है. 1 लीटर पानी में 1 ग्राम बाविस्टिन या थायोफिनेट मिथाइल मिलाकर घोल तैयार करें और बीज को उपचारित करें. मिट्टी के उपचार के लिए 10 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा को 2 से 3 क्विंटल गोबर की खाद में मिलाकर खेत की अंतिम जुताई के समय डालना चाहिए. यह प्रक्रिया मिट्टी से फैलने वाले संक्रमण को रोकने में 100 प्रतिशत तक कारगर साबित होती है और पौधों को शुरुआती मजबूती प्रदान करती है.
लाल सड़न रोग से प्रभावित खेतों के लिए डॉ. संजीव कुमार पाठक ने ‘फसल चक्र’ अपनाने की सलाह दी है. उन्होंने कहा अगर किसी खेत में पहले से ही लाल सड़न रोग का प्रकोप रहा हो और फसल की कटाई हो चुकी हो, तो वहां तुरंत दोबारा गन्ने की बुवाई न करें. इस रोग का फंगस गन्ने की कटाई के बाद भी लगभग छह महीने तक मिट्टी में सक्रिय रहता है. ऐसी स्थिति में कम से कम एक सीजन के लिए गन्ने के स्थान पर किसी अन्य फसल की बुवाई करें ताकि रोग का चक्र टूट सके.
रोगरोधी किस्मों का चयन और सावधानी
गन्ना किसानों के लिए बसंत कालीन बुवाई का समय मुफीद माना जाना है. बशर्ते किसान सही किस्मों का चुनाव करें. को.शा. 18231 और 13235 जैसी किस्में रोगरोधी होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की जलवायु के लिए अनुकूल भी हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि रोगग्रस्त पौधों को खेत से तुरंत निकालकर नष्ट कर दें और जल निकासी का उचित प्रबंध रखें. सही समय पर वैज्ञानिक जानकारी और सतर्कता ही किसानों को इस ‘गन्ने के कैंसर’ कहे जाने वाले रोग से मुक्ति दिला सकती है और आर्थिक नुकसान से बचा सकती है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें





