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Supreme Court judge Justice BV Nagarathna statement: हाल के दिनों में जब देश में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर लगातार चर्चा हो रही है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की एक नामी जस्टिस ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं को पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए. उन्होंने इस मामले को और स्पष्ट करते हुए साफ-साफ कहा कि इन संस्थाओं पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक दबाव या प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यही लोकतंत्र की निष्पक्षता की बुनियाद है.
चुनाव आयोग को रहना होगा पूरी तरह स्वतंत्र: जस्टिस नागरत्ना
पटना. सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice B. V. Nagarathna) ने शनिवार को एक व्याख्यान में कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए. कोई राजनीतिक दबाव या प्रभाव इन पर नहीं पड़ना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि ये संस्थाएं लोकतंत्र की मजबूत नींव हैं और इनकी स्वतंत्रता बिना लोकतंत्र सही मायने में नहीं चल सकता. जस्टिस नागरत्ना पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान में बोल रही थीं. “अधिकारों से परे संविधानवाद: संरचना क्यों मायने रखती है”, विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि संस्थाओं की मजबूती पर भी टिका है.
तीन संस्थाएं, एक जैसी संरचना
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि भारत निर्वाचन आयोग ( Election Commission of India), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) यानी कैग (CAG) और भारतीय वित्त आयोग ( Finance Commission of India) का डिजाइन एक जैसा है. ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त हैं और इन्हें ऐसे काम सौंपे गए हैं जहां सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया निष्पक्षता नहीं दे सकती. जस्टिस नागरत्ना ने साफ कहा कि चुनाव कोई रूटीन प्रक्रिया नहीं है.
नियंत्रण का मतलब प्रतिस्पर्धा पर असर
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ये सभी संस्थाएं विशेषज्ञता आधारित हैं और इन्हें बाहरी प्रभावों से मुक्त रखा गया है. उनका काम ऐसे क्षेत्रों की निगरानी करना है, जहां निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है और जहां सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाएं पर्याप्त नहीं होतीं. बकौल जस्टिस नागरत्ना, ये वो तंत्र है जिससे राजनीतिक सत्ता बनती है. समय पर चुनाव होने से सरकार बदलती है और लोकतंत्र चलता रहता है. लेकिन अगर इस प्रक्रिया पर काबू कर लिया जाए तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तें भी तय हो जाती हैं. इसलिए चुनाव आयोग को स्वतंत्र रखना बेहद जरूरी है.
टीएन शेषन मामले की याद दिलाई
जस्टिस नागरत्ना ने 1995 के टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले का जिक्र किया. सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त चुनाव आयोग को मजबूत संवैधानिक संस्था माना था. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर चुनाव कराने वाले लोग उन पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं तो निष्पक्षता कैसे बचेगी? यह बात आज भी लागू होती है. जस्टिस नागरत्ना ने इतिहास का सबक भी याद दिलाया. उन्होंने कहा कि जब संवैधानिक ढांचा कमजोर पड़ता है तो संस्थाएं एक-दूसरे पर नजर रखना छोड़ देती हैं. चुनाव होते रहते हैं, अदालतें चलती रहती हैं, कानून बनते रहते हैं, लेकिन सत्ता पर असली अंकुश नहीं रहता. नतीजा- लोकतंत्र सिर्फ दिखावे का रह जाता है.
लोकतंत्र की रक्षा का यह समय
व्याख्यान में जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र और राज्यों को बराबर का साझेदार मानने की बात भी कही. उन्होंने कहा कि राज्य अधीनस्थ नहीं हैं. सहयोगी संघवाद तभी मजबूत होगा जब सभी संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष रहें. जस्टिस नागरत्ना का यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रही हैं. जस्टिस नागरत्ना का संदेश साफ है- चुनाव आयोग से स्वतंत्र रूप से काम करने की अपेक्षा हर नागरिक को है. तभी जनता का विश्वास बना रहेगा और लोकतंत्र सच्चा बनेगा. साफ है कि जस्टिस नागरत्ना का स्पष्ट संदेश है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की स्वतंत्रता केवल कानूनी जरूरत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है.
कौन हैं जस्टिस बी वी नागरत्ना?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (पूर्व नाम बेंगलुरु वेंकटरमैया नागरत्ना) 30 अक्टूबर 1962 को बेंगलुरु में जन्मीं एक वरिष्ठ भारतीय न्यायाधीश हैं. वे पूर्व मुख्य न्यायाधीश ई.एस. वेंकटरमैया की पुत्री हैं, जिन्होंने 1989 में भारत के 19वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की थी. दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में बी.ए. (ऑनर्स) और कानून की डिग्री पूरी करने के बाद 1987 में उन्होंने वकालत शुरू की और 2008 में कर्नाटक हाईकोर्ट की अतिरिक्त जज बनीं, फिर 2010 में स्थायी जज बनीं. अगस्त 2021 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट की जज नियुक्त किया गया. जस्टिस नागरत्ना 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली हैं, हालांकि उनका कार्यकाल मात्र 36 दिन का होगा. वे स्वतंत्र विचारों और संवैधानिक मूल्यों के लिए जानी जाती हैं. बता दें कि 2023 में नोटबंदी मामले में उन्होंने अकेले असहमति जताई थी और 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के एक फैसले में जस्टिस विपुल पंचोली की सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति का विरोध किया था, जिसे उन्होंने न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए हानिकारक बताया.
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