बंगाल चुनाव: ममता के वोटबैंक में कांग्रेस की सेंध, मुस्लिम उम्मीदवारों की उतारी फौज, ओवैसी की भी बढ़ा दी टेंशन

Date:


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस ने दो दशक बाद ‘एकला चलो’ रणनीति अपनाते हुए बड़ा दांव खेला है. कांग्रेस ने राज्य की दूसरी प्रमुख पार्टियों की तुलना में सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. पार्टी ने इसके साथ ही साफ संकेत दिया है कि वह राज्य के बड़े मुस्लिम वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है. कमजोर जनाधार के बावजूद कांग्रेस का यह कदम चुनावी रणनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है.

कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को भी चुनाव मैदान में उतारकर यह दिखाने की कोशिश की है कि पार्टी इस बार मुकाबले को गंभीरता से लड़ना चाहती है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि बंगाल में मुस्लिम आबादी को देखते हुए टिकट वितरण किया गया है और यह पूरी तरह से सामाजिक समीकरणों पर आधारित रणनीति है.

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो कांग्रेस ने करीब 70 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. वहीं तृणमूल कांग्रेस ने लगभग 47 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि लेफ्ट और ISF गठबंधन ने करीब 60 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं. दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा है.

बंगाल चुनाव में मुस्लिम फैक्टर कितना अहम?

कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने भी इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि पार्टी हमेशा सभी जाति और धर्म के लोगों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है. उनके मुताबिक, ‘बंगाल में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर उन्हें अधिक टिकट दिए गए हैं. हर दल में आबादी के अनुसार टिकट देने की मांग उठती है.’

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी करीब 30 प्रतिशत है और 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर यह वोट बैंक जीत-हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाता है. खास तौर पर मुर्शिदाबाद (66%), मालदा (51%), उत्तर दिनाजपुर (49%), बीरभूम (37%) और दक्षिण 24 परगना (35%) जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में मौजूद हैं.

मुस्लिम वोट बंटने का डर

2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी के उभार के बीच मुस्लिम वोटरों का बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस के साथ जाता रहा है. लेकिन इस बार समीकरण थोड़ा बदलते नजर आ रहे हैं. लेफ्ट-ISF गठबंधन, कांग्रेस की ‘एकला चलो’ रणनीति और AIMIM जैसे दलों की एंट्री ने मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना बढ़ा दी है.

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि पार्टी ने टिकट वितरण ‘विनिंग फैक्टर’ के आधार पर किया है और इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है.

शून्य पर सिमटी कांग्रेस की हालत में होगा सुधार?

गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन में 91 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे सिर्फ 2.9% वोट मिले और एक भी सीट नहीं जीत सकी. ऐसे में इस बार पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ते हुए अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है.

इस चुनाव में एक और दिलचस्प पहलू असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और AJUP का गठबंधन भी है, जिसने 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. दावा किया जा रहा है कि इस गठबंधन की ओर से भी बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे जाएंगे, जिससे मुकाबला और त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है.

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में इस बार मुस्लिम वोट बैंक को लेकर जबरदस्त राजनीतिक मुकाबला देखने को मिल रहा है. कांग्रेस ने सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर साफ कर दिया है कि वह इस वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है. अब देखना यह होगा कि उसकी यह रणनीति चुनावी नतीजों में कितना असर दिखाती है.



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related