कनाडा में बसने वाला पहला भारतीय कौन था, जिसने पंजाबियों के लिए खोल दिया परदेस का द्वार?

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कनाडा में बसने वाला पहला भारतीय, जिसने पंजाबियों के लिए खोला परदेस का द्वार?

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कनाडा आज पंजाबियों के लिए ‘दूसरे घर’ जैसा है. वहां हर जगह भारतीयों और खासकर सिखों का दबदबा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस बर्फीले देश में कदम रखने वाला सबसे पहला भारतीय कौन था? वो शख्स, जिसने 129 साल पहले ब्रिटिश कोलंबिया की धरती पर उतरकर अनजाने में लाखों पंजाबियों के लिए परदेस के द्वार खोल दिए थे?

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बहुत कम लोगों को पता होगा रिसालदार मेजर केसर सिंह के बारे में. (Photo- Wikipedia)

दुनियाभर के अलग-अलग देशों में भारतीय लोग बसे हैं. उन्होंने उस परदेस की धरती को अपना लिया है. चाहे वो ऑस्ट्रेलिया हो या इंग्लैंड. लेकिन कनाडा की धरती की बात ही कुछ और है, जहां की राजनीति से लेकर खेती और बिजनेस तक हर जगह भारतीयों, खासकर पंजाबियों का मजबूत प्रभाव देखने को मिलता है. शायद यही वजह है कि आज कनाडा को ‘मिनी पंजाब’ कहा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस बर्फीले देश में सबसे पहले कदम रखने वाला पहला हिंदुस्तानी कौन था? शायद ही किसी को पता होगा. लेकिन आज हम आपको India’s First सीरीज के तहत उस शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कनाडा में बसने वाले पहले भारतीय बने और पंजाबियों के लिए परदेस का द्वार खोल दिया. हम बात कर रहे हैं रिसालदार मेजर केसर सिंह की, जिन्होंने साल 1897 में न केवल कनाडा की धरती पर कदम रखा, बल्कि वहां बसने वाले पहले भारतीय भी बने.

केसर सिंह की इस साहसिक यात्रा ने आगे चलकर लाखों पंजाबियों के लिए ‘सात समंदर पार’ का सपना हकीकत में बदल दिया. साल 1897 का वह दौर ब्रिटिश साम्राज्य के गौरव का समय था. लंदन में महारानी विक्टोरिया की डायमंड जुबली (हीरक जयंती) का आयोजन किया जा रहा था. इस खास मौके पर ब्रिटिश भारतीय सेना के चुनिंदा सैनिकों को लंदन भेजा गया था. इस दल का नेतृत्व रिसालदार मेजर केसर सिंह कर रहे थे, जो 25वीं कैवेलरी (फ्रंटियर फोर्स) के एक अधिकारी थे. यह यात्रा हांगकांग से शुरू होकर समुद्री रास्ते से लंदन तक जानी थी, क्योंकि वह सबसे बेहतर और सुरक्षित मार्ग था जो कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत से होकर गुजरती थी. बस इस रास्ता ने ही उनकी लाइफ को पूरी तरह बदल दिया और एक नई दिशा दिखाई. जब ये सैनिक ब्रिटिश कोलंबिया (कनाडा) से गुजरे, तो केसर सिंह वहां की उपजाऊ जमीन और माहौल से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वहीं बसने का फैसला किया. बाद में इन्होंने ही पंजाबियों को वहां बसाना शुरू किया.

रिसालदार मेजर केसर सिंह ने साल 1897 में कनाडा की धरती पर कदम रखा था.
(Photo- Wikipedia)

भारत लौटने के बजाय लिया बड़ा फैसला
मई 1897 में केसर सिंह और उनके साथी ‘एम्प्रेस ऑफ इंडिया’ जहाज से वैंकूवर के तट पर उतरे. उस दौरान इनकी पारंपरिक वर्दी और साफे को वहां के लोग हैरानी से देख रहे थे. लेकिन केसर सिंह सिर्फ इस अनुभव को महसूस नहीं कर रहे थे, बल्कि उस जगह को समझने की कोशिश कर रहे थे. उन्हें वहां की जमीन और माहौल में संभावनाएं दिखाई दे रही थीं, जो काफी हद तक पंजाब से मिलती-जुलती थीं. वहां खेती और मेहनत से आगे बढ़ने के अवसर उन्हें साफ नजर आ रहे थे. इस तरह लंदन में समारोह खत्म होने के बाद जब बाकी सैनिक भारत लौटने की तैयारी कर रहे थे, तब केसर सिंह ने एक अलग रास्ता चुना. उन्होंने भारत वापस जाने के बजाय कनाडा में ही रुकने का फैसला किया. यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि उस समय वहां कोई पहचान या सहारा नहीं था. फिर भी उन्होंने जोखिम उठाया और एक नई जिंदगी शुरू की.

पंजाबियों के लिए खोले परदेस के द्वार
कनाडा में बसने के दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. उन्होंने सबसे पहले लकड़ी के मिलों में काम करना शुरू किया, जो काफी मेहनत वाला काम था. मौसम भी उनके लिए चुनौतीपूर्ण था. लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को उस माहौल में ढालना शुरू किया. कुछ समय बाद वे कनाडा में खेती करने लगे और सफलता हासिल की. इसके बाद केसर सिंह ने अपने सगे-संबंधियों को भी चिट्ठी लिखकर कनाडा में मौजूद अवसरों के बारे में बताया. उनकी कहानियां जब पंजाब के गांवों तक पहुंचीं, तो वहां के युवाओं में विदेश में बसने और सफलता हासिल करने की एक नई उम्मीद जगी. ऐसे में केसर सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए पंजाब से और भी लोग कनाडा पहुंचने लगे. केसर सिंह ने नए आने वाले भारतियों को बसने में मदद की और काम ढूंढने में सहयोग दिया. उन्होंने वैंकूवर और आसपास के इलाकों में सिखों और पंजाबियों का एक मजबूत आधार तैयार किया, जिससे आज का विशाल भारतीय समुदाय वहां पूरी मजबूती के साथ खड़ा है.

कनाडा के गौरवशाली इतिहास में अमर हुए केसर सिंह
आज केसर सिंह का नाम कनाडा के राष्ट्रीय संग्रहालयों और ऐतिहासिक अभिलेखों में बड़े सम्मान के साथ दर्ज है. साल 1997 में उनके आगमन के 100 साल पूरे होने पर कनाडा सरकार ने विशेष डाक टिकट और सम्मान समारोह आयोजित किए थे. ब्रिटिश कोलंबिया की संसद में आज भी उनकी बहादुरी और दूरदर्शिता को याद किया जाता है. केसर सिंह ने अपनी मेहनत, ईमानदारी और अनुशासन से कनाडाई समाज में भारतीयों के लिए जो इज्जत कमाई थी, उसी का नतीजा है कि आज वहां का हर भारतीय गर्व महसूस करता है. सोचिए, अगर आज से 129 साल पहले केसर सिंह लंदन के उस समारोह में शामिल होने के लिए वैंकुअर नहीं उतरे होते तो शायद आज कनाडा मिनी पंजाब नहीं कहलाता. ऐसे में आज जब भी कोई पंजाबी या अन्य हिंदुस्तानी कनाडा की जमीन पर कदम रखता है, तो उसकी सफलता की नींव में केसर सिंह का वह जज्बा जरूर शामिल होता है.

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Niranjan Dubey

न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें



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