आज से ठीक 46 साल पहले 6 अप्रैल 1980 को नई दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी की बुनियाद रखी थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि ‘सिफर’ से शुरू हुआ उनका यह सफर महज साढ़े चार दशकों में ही ‘अब की बार, 400 पार’ के नारे तक पहुंच जाएगा. ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ की सोच के साथ भाजपा ने हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जिस बीज का रोपण किया था, वह आज एक विशालकाय वटवृक्ष बन चुका है. देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब भाजपा के लिए कोई चुनौती नहीं रह गई है लेकिन क्षेत्रीय दल दुश्वारी बने हुए हैं. ऐसे में अगले कुछ हफ्तों में बंगाल, तमिलनाडु और केरल की ईवीएम से निकलने वाले चुनाव नतीजे पार्टी की भावी रणनीति के लिए काफी अहम साबित होंगे.
90 के दशक तक देश में कांग्रेस का एक तरह से एकछत्र राज हुआ करता था. लेकिन 1989 के बाद केंद्र में गठबंधन सरकारों के सत्तारूढ़ होने के ट्रेंड के साथ ही राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल गई. राजनीतिक अनिश्चतता के इस दौर में क्षेत्रीय स्तर पर कई क्षत्रप उभरे, जिन्होंने धीरे-धीरे सत्ता की चाबी अपने हाथों में ले ली. इनमें टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू और अन्नाद्रमुक की जयललिता के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं.
इस बीच, कांग्रेस की लगातार खिसकती जमीन पर भाजपा काबिज होती चली गई. बीते कुछ सालों के दौरान कांग्रेस पार्टी की वैचारिक स्तर पर शून्यता और संगठनात्मक स्तर पर कमजोरी ने भाजपा के लिए एक तरह से ‘वॉकओवर’ जैसी स्थिति पैदा कर दी. खासकर उत्तर, मध्य और पश्चिम के राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस की जगह ले ली. आज इन राज्यों में कांग्रेस कहीं भी नजर नहीं आती. लेकिन भाजपा के लिए भी अगर कर्नाटक को छोड़ दिया जाए तो दक्षिण के अन्य राज्यों और पूर्व में बंगाल में सत्ता आज भी दूर की कौड़ी बनी हुई है. हालांकि दो साल पहले जिस तरह से भाजपा ओडिशा में वर्षों से जमे दिग्गज नेता नवीन पटनायक की बीजद सरकार को उखाड़ने में कामयाब रही, वैसी ही उम्मीद अब उसके समर्थकों को बंगाल में है. लेकिन बंगाल की स्थिति ओडिशा से अलग है. वहां फायर ब्रांड लीडर ममता बैनर्जी की काट में भाजपा को कोई नेता नहीं मिल पा रहा है. भाजपा अब भी या तो तृणमूल से ही आयातित नेताओं पर निर्भर है या मोदी-शाह की जोड़ी पर.
भाजपा के पास क्षेत्रीय क्षत्रपों का अकाल…
दरअसल, भाजपा की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और वह है सत्ता का अति केंद्रीकरण. राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसा करिश्माई नेतृत्व पार्टी के पास जरूर है, लेकिन जब हम राज्यों पर नजर दौड़ाते हैं तो उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़णवीस और असम में हिमंत बिस्वा सरमा को छोड़कर स्थानीय स्तर पर ऐसे क्षत्रपों का सख्त अकाल दिखाई देता है, जो अपने दम पर चुनाव जिताने की कुव्वत रखते हों. कई राज्यों में तो ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनकी अपनी कोई जमीन नहीं है. इनकी राजनीतिक डोर पूरी तरह केंद्रीय नेतृत्व के हाथों में है. यदि मोदी या अमित शाह इनके सिर के ऊपर से हाथ हटा लें तो इनका पूरा सियासी वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा.
‘बंगाली अस्मिता’ और ‘तमिल पहचान’ आड़े आई…
क्षेत्रीय दलों के पास ऐसे नेता हैं, जो न केवल अपने राज्य की नब्ज पहचानते हैं, बल्कि जनता के बीच ‘लार्जर दैन लाइफ’ की छवि रखते हैं. क्षेत्रीय दलों ने भाजपा के खिलाफ मुकाबले को ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ बना दिया है. बंगाल में ‘बंगाली अस्मिता’ और तमिलनाडु में ‘तमिल पहचान’ या ‘द्रविड़ संस्कृति’ के नाम पर ये दल भाजपा को एक उत्तर भारतीय या हिंदी पट्टी की पार्टी के रूप में चित्रित करने का प्रयास करते हैं और कमोबेश इसमें सफल भी रहे हैं. ऐसे में इन राज्यों में भाजपा का राष्ट्रीय नैरेटिव क्षेत्रीय भावनाओं के आगे फीका पड़ जाता है.
यही वह चुनौती है, जो भाजपा की पूरे देश में मौजूदगी के बावजूद उसे वास्तविक तौर पर ‘अखिल भारतीय पार्टी’ होने से रोकती है. बंगाल में वह जहां ममता की कड़ी चुनौती से दो-चार है तो दक्षिण में कर्नाटक को छोड़ दें, तो उसके पास ऐसा कोई स्थानीय क्षत्रप नहीं है, जिससे अगले दस सालों में भी पार्टी को सत्ता में लाने की उम्मीद की जा सके. यहां तक कि केरलम जैसे राज्य में जहां वामपंथी दल अब अपनी राष्ट्रीय प्रासंगिकता खोकर एक क्षेत्रीय इकाई की तरह सिमट गए हैं, वहां भी भाजपा को अपनी जमीन तलाशने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है.
यह भी सच है कि भाजपा की एक आंख वर्तमान पर तो दूसरी आंख भविष्य पर रहती है. ऐसे में उसकी मंशा यही होगी कि वर्ष 2030 में जब वह अपनी स्थापना की स्वर्ण जयंती मना रही हो, उस समय तक देश के शेष हिस्से को भी केसरिया रंग से रंगने की उसके पास एक ठोस रणनीति हो.





