परमाणु ऊर्जा के वैश्विक अखाड़े में भारत ने वह महाशक्तिशाली दांव चला है जिसने बीजिंग से लेकर वाशिंगटन तक के गलियारों में खलबली मचा दी है। भारतीय वैज्ञानिकों ने कल्पक्कम के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) को ‘क्रिटिकल’ कर न केवल विज्ञान की सीमाओं को लांघा है बल्कि चीन की उस रफ़्तार को भी सीधी चुनौती दे दी है जो खुद को परमाणु जगत का नया बादशाह मान रहा था. यह महज एक रिएक्टर की शुरुआत नहीं बल्कि उस थोरियम के खजाने का ताला खोलने की मास्टर-की है जिसे अब तक दुनिया की मुट्ठी भर शक्तियां अपनी जागीर समझती थीं. जहां चीन 58 रिएक्टरों की फौज और अरबों डॉलर के निवेश से दुनिया को डरा रहा है, वहीं भारत ने स्वदेशी तकनीक सिद्ध कर दी है जो अपनी खपत से कहीं ज़्यादा ईंधन उगलने का दम रखती है. अब ऊर्जा सुरक्षा की शर्तें दुनिया नहीं बल्कि खुद हिंदुस्तान लिखेगा. यह उस संकल्प की जीत है जो भारत को अगले 300 सालों तक ‘ऊर्जा का सम्राट’ बनाने की ताकत रखता है.
नकल बनाम असल का मुकाबला?
चीन ने पिछले एक दशक में रिकॉर्ड तोड़ रफ्तार से परमाणु रिएक्टर खड़े किए हैं, लेकिन उसकी पूरी ताकत यूरेनियम और विदेशी तकनीक (रूसी और पश्चिमी डिजाइन) पर टिकी है. चीन आज भी यूरेनियम के लिए आयात पर निर्भर है.
· भारत का मास्टरस्ट्रोक: भारत ने कल्पक्कम में जो कर दिखाया है वह ‘मेक इन इंडिया’ का सबसे घातक स्वरूप है. हमने किसी की नकल नहीं की बल्कि उस फास्ट ब्रीडर तकनीक को मास्टर किया है जिसे अमेरिका और जापान जैसे देश दशकों की कोशिश के बाद भी व्यावसायिक रूप से सफल नहीं बना पाए.
आने वाली पीढ़ियों का अंधेरा होगा दूर
भारत के पास मौजूद करीब 2.25 लाख टन थोरियम का भंडार ऊर्जा का वह कुबेर खजाना है जो देश को अगले 300 से 400 सालों तक बिना किसी बाधा के बिजली देने की गारंटी देता है. कल्पक्कम के स्वदेशी PFBR ने इस खजाने का ताला खोलने वाली वह जादुई चाबी तैयार कर ली है जिसे दुनिया के विकसित देश भी नहीं बना पाए. जहां चीन और अमेरिका यूरेनियम के खत्म होते भंडारों और आयात की मजबूरियों से जूझ रहे हैं, वहीं भारत अपने समुद्र तटों की रेत में छिपे थोरियम से भविष्य का परमाणु साम्राज्य खड़ा कर रहा है. यह तकनीक भारत को न केवल ऊर्जा के क्षेत्र में पूर्ण स्वराज दिलाएगी बल्कि उसे आने वाली कई सदियों के लिए दुनिया का एनर्जी हब बना देगी. यह महज एक रिएक्टर की सफलता नहीं बल्कि भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए अंधेरे के अंत की घोषणा है.
थोरियम: भारत का ‘साइलेंट वेपन’
दुनिया यूरेनियम के खत्म होते भंडारों को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के पास थोरियम का दुनिया का सबसे बड़ा खजाना (करीब 2.25 लाख टन) है.
· दुनिया की मजबूरी: बाकी देश यूरेनियम खत्म होने पर अंधेरे की ओर बढ़ेंगे.
· भारत की मजबूती: कल्पक्कम रिएक्टर वह ‘जादुई मशीन’ है जो थोरियम को बिजली बनाने वाले ईंधन में तब्दील करने की चाबी है. एक बार यह चक्र पूरी तरह शुरू हो गया तो भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश होगा जिसके पास अगले 300 सालों तक असीमित और सबसे सस्ती बिजली होगी.
पश्चिमी देशों से कितना आगे है भारत?
अमेरिका और यूरोप के पास पुराने रिएक्टरों की फौज तो है लेकिन उनकी तकनीक खर्च करने वाली है, पैदा करने वाली नहीं. भारत का PFBR रूस के बाद दुनिया का दूसरा ऐसा रिएक्टर है जो अपनी खपत से ज्यादा ईंधन पैदा करेगा. तकनीक के मामले में भारत ने फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों को पीछे छोड़ते हुए उस सेकंड स्टेज को पार कर लिया है जहां पहुंचना कई देशों का केवल सपना है.
सवाल-जवाब
क्या भारत थोरियम तकनीक में चीन से आगे निकल गया है?
हां, रणनीतिक रूप से. चीन भले ही यूरेनियम रिएक्टरों में बड़ा है लेकिन भारत का थोरियम रोडमैप और स्वदेशी फास्ट ब्रीडर तकनीक का सफल होना उसे भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा में चीन से कहीं ज्यादा सुरक्षित और स्वतंत्र बनाता है.
कल्पक्कम रिएक्टर को ‘गेम चेंजर’ क्यों कहा जा रहा है?
क्योंकि यह रिएक्टर यूरेनियम की कमी की बाधा को खत्म कर देगा. यह प्लूटोनियम बनाएगा जो भारत के असीमित थोरियम भंडार को इस्तेमाल करने के लिए अनिवार्य है. यह भारत की ऊर्जा गुलामी की जंजीरें काटने वाला कदम है.
विकसित देश इस तकनीक में पीछे क्यों रह गए?
फास्ट ब्रीडर तकनीक इंजीनियरिंग के लिहाज से बेहद जटिल और खर्चीली है. कई देशों ने सुरक्षा और तकनीकी चुनौतियों के कारण इसे बीच में ही छोड़ दिया जबकि भारतीय वैज्ञानिकों ने बिना किसी बाहरी मदद के इसे मुमकिन कर दिखाया.





