केजरीवाल जज के सामने खुद देंगे अपनी दलील, बिना डिग्री-काला कोट ये कैसे संभव? समझें एडवोकेट एक्ट की धारा 32 का गणित

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दिल्ली हाईकोर्ट के कमरा नंबर 35 में सोमवार को माहौल तब पूरी तरह बदल गया जब कटघरे में खड़े एक हाई-प्रोफाइल आरोपी ने वकील की फौज को पीछे हटाकर सीधे जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की आंखों में आंखें डालकर अपनी बात कही. अमूमन अदालतों में काले कोट वाले वकीलों की दलीलें गूंजती हैं लेकिन अरविंद केजरीवाल ने ‘पार्टी-इन-पर्सन’ के तौर पर खुद पैरवी करने का ऐलान कर कानूनी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. यह दृश्य किसी फिल्मी अदालती ड्रामे से कम नहीं था. एक तरफ देश के सबसे बड़े वकीलों में शुमार सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इसपर कड़ी आपत्ति जता रहे थे, तो दूसरी तरफ केजरीवाल बिना किसी वकालतनामे के अपने कानूनी अधिकारों की दुहाई दे रहे थे. अब सवाल यह उठाता है कि क्या बिना डिग्री के भी कोई शख्स कोर्ट में दलीलें दे सकता है. एडवोकेट एक्ट 1961 इसे लेकर क्‍या कहता है. आइए इसे विस्तार से समझते हैं:

1. क्या कहता है कानून: एडवोकेट एक्ट की धारा 32
आमतौर पर अदालत में केवल वही व्यक्ति वकालत कर सकता है जो बार काउंसिल में नामांकित (Enrolled) हो. लेकिन एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 32 कोर्ट को एक विशेष शक्ति देती है.

· धारा 32: इस प्रावधान के अनुसार कोई भी अदालत या प्राधिकरण किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो वकील नहीं है अपने सामने किसी विशेष मामले में उपस्थित होने और दलीलें देने की अनुमति दे सकता है.

· अदालत का विवेक: यह कोई मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि अदालत का विवेकाधिकार है. अगर जज को लगता है कि व्यक्ति अपने मामले को स्पष्ट रूप से रखने में सक्षम है तो वह अनुमति दे सकता है.

2. ‘पार्टी-इन-पर्सन’ का अधिकार
सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर III रूल 1 के तहत किसी भी पक्षकार को यह अधिकार है कि वह स्वयं अपने एजेंट या वकील के माध्यम से अदालत में उपस्थित हो सके.

· स्वयं की पैरवी: अगर कोई व्यक्ति वकील नहीं करना चाहता तो वह ‘पार्टी-इन-पर्सन’ के रूप में अपनी बात रख सकता है.

· शर्त: हाईकोर्ट के नियमों के अनुसार ऐसे व्यक्ति को अक्सर एक ‘सक्षमता प्रमाण पत्र’ (Certificate of Competence) या रजिस्ट्री से मंजूरी लेनी होती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह अदालती कार्यवाही की गरिमा और प्रक्रिया को समझता है.

3. अरविंद केजरीवाल का मामला: पेच कहां है?
केजरीवाल ने हाईकोर्ट में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के सामने खुद दलीलें देने की बात कही. यहां मुख्य कानूनी बिंदु यह थे:

· वकालतनामा का डिस्चार्ज: कोर्ट और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति ने पहले से वकील नियुक्त किया है तो वह सीधे खुद बहस नहीं कर सकता. उसे पहले अपने वकील को केस से हटाना होगा.

· केजरीवाल का तर्क: केजरीवाल ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने इस विशेष ‘रिक्यूजल आवेदन’ (जज को केस से हटने की अर्जी) के लिए किसी को वकालतनामा जारी नहीं किया है, इसलिए वह अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए खुद बहस करेंगे.

· प्रक्रियात्मक बाधा: उन्होंने यह भी बताया कि ‘पार्टी-इन-पर्सन’ होने के कारण वे ई-फाइलिंग नहीं कर पा रहे थे इसलिए उन्होंने हार्ड कॉपी स्वीकार करने का अनुरोध किया.

4. बिना डिग्री पैरवी की सीमाएं
हालांकि कानून अनुमति देता है लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं:

· नियमित अभ्यास नहीं: धारा 32 के तहत केवल एक विशेष केस में अनुमति मिलती है. कोई व्यक्ति इसे पेशा नहीं बना सकता.

· कोर्ट का अनुशासन: यदि ‘पार्टी-इन-पर्सन’ कोर्ट का समय बर्बाद करता है या प्रक्रिया का पालन नहीं करता तो कोर्ट उसकी अनुमति रद्द कर सकता है.

· थियेट्रिक्स पर रोक: जैसा कि इस मामले में सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई कोर्ट का मंच कानूनी तर्कों के लिए है न कि राजनीतिक ड्रामे या प्रचार के लिए.



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