पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में 1 अप्रैल को हुए जजों के घेराव को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की शुरुआती जांच रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. सुप्रीम कोर्ट में पेश इस रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित तरीके से अंजाम दिया गया घटनाक्रम था, जिसकी शुरुआत स्थानीय स्तर पर किए गए एक ऐलान से हुई और देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोग मौके पर इकट्ठा हो गए.
13 घंटे तक न्यायिक अधिकारियों का घेराव
हालात तब और बिगड़ गए जब देर रात पुलिस और केंद्रीय बलों की मदद से इन अधिकारियों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की गई. NIA की रिपोर्ट बताती है कि बचाव के दौरान भी अधिकारियों का काफिला सुरक्षित नहीं था. जैसे ही उन्हें बाहर निकाला गया, कई स्थानों पर उनके काफिले पर पत्थरबाजी की गई. इस हमले में एक वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसके कारण वाहन पलट गया. यह दर्शाता है कि हमलावरों ने न केवल घेराव किया बल्कि बचाव अभियान को भी निशाना बनाया.
आगे औरतें, पीछे खड़े पुरुष
जांच एजेंसी ने अपने शुरुआती निष्कर्षों में कई ऐसे संकेतों की ओर इशारा किया है, जो इस पूरे घटनाक्रम को पूर्व-नियोजित साजिश बताते हैं. भीड़ में महिलाओं को आगे रखा गया था, जबकि पुरुष पीछे से गतिविधियों को नियंत्रित कर रहे थे. इसके अलावा, बीडीओ कार्यालय में लगे 16 सीसीटीवी कैमरों में से 9 बंद पाए गए, जिनमें मुख्य प्रवेश द्वार के कैमरे भी शामिल थे. इस तरह की स्थिति ने जांच एजेंसी के संदेह को और मजबूत किया है कि यह सब पहले से तय योजना के तहत किया गया.
इस पूरे मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्य प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अगुवाई वाली पीठ ने साफ कहा कि यह कोई सामान्य भीड़ का उग्र व्यवहार नहीं था, बल्कि एक ‘प्रेरित और योजनाबद्ध’ घटना थी. अदालत ने राज्य पुलिस की जांच पर भरोसा न जताते हुए इस मामले से जुड़ी सभी एफआईआर NIA को सौंपने का आदेश दिया है.
सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक की भूमिका पर भी नाराजगी जताई. कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि घटना के दौरान न्यायपालिका और प्रशासन के बीच समुचित समन्वय नहीं था. यहां तक कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक संबंधित अधिकारियों की पहुंच न होना भी अदालत के लिए चिंता का विषय बना.
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग की तरफ से कराई जा रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को माना जा रहा है. मतदाता सूची में नाम हटाने और संशोधन को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष था, जिसे कथित तौर पर संगठित तरीके से भड़काया गया और वह हिंसक रूप में सामने आया.
फिलहाल, इस मामले में 100 से अधिक लोगों को नामजद किया गया है, जिनमें से 24 की गिरफ्तारी हो चुकी है. हालांकि, जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल शुरुआत है और इसके पीछे की बड़ी साजिश तथा अन्य शामिल लोगों की पहचान अभी बाकी है. NIA को आगे की जांच के दौरान नई एफआईआर दर्ज करने और पूरे नेटवर्क का खुलासा करने की भी छूट दी गई है.
मालदा की यह घटना केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि इसने यह भी दिखाया है कि किस तरह संगठित तरीके से भीड़ को जुटाकर संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती दी जा सकती है. NIA की रिपोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को एक बड़े और सुनियोजित प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसने न्यायपालिका जैसे संवेदनशील संस्थान को भी निशाना बनाया. यही वजह है कि अब इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है और इसकी जांच भी उसी स्तर पर आगे बढ़ रही है.





