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Earth Population Limit: धरती की बढ़ती आबादी और प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होने पर आधारित एक नई रिसर्च के नतीजे डराते हैं. फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कोरी ब्रैडशॉ की स्टडी के मुताबिक, पृथ्वी अब इंसानी बोझ सहने की स्थिति में नहीं है. वर्तमान में 8.3 अरब की आबादी को धरती केवल इसलिए पाल पा रही है क्योंकि हम फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं. रिसर्च चेतावनी देती है कि अगर लाइफस्टाइल और संसाधनों के उपयोग के तरीके नहीं बदले, तो आने वाले दशकों में खाद्य सुरक्षा और जलवायु स्थिरता पूरी तरह चरमरा जाएगी.
इंसानी बोझ से दब रही है धरती (AI जेनेरेटेड फोटो)
नई दिल्ली: वैज्ञानिकों ने एक ऐसी रिपोर्ट पेश की है जो हमें चैन से सोने नहीं देगी. फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के इकोलॉजिस्ट कोरी ब्रैडशॉ के नेतृत्व में हुई एक नई रिसर्च कहती है है कि इंसान अपनी औकात से ज्यादा धरती के संसाधनों को चबा रहा है. हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहां प्रकृति अब और सहने की स्थिति में नहीं है. पिछले दो सौ सालों के जनसंख्या रिकॉर्ड को खंगालने के बाद रिसर्चर्स इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमारी ग्रोथ का पैटर्न अब ‘खतरे की घंटी’ बजा रहा है. यह सिर्फ आबादी बढ़ने का मामला नहीं है, बल्कि उस रफ्तार का है जिससे हम जमीन, पानी और ऊर्जा को खत्म कर रहे हैं. रिसर्च में बताया गया है कि 1950 से पहले आबादी और तरक्की एक साथ कदमताल कर रहे थे. ज्यादा लोग मतलब ज्यादा काम, ज्यादा रिसर्च और ज्यादा इनोवेशन. लेकिन 1960 के दशक के बाद खेल बदल गया. आबादी तो बढ़ती रही, लेकिन उसकी ग्रोथ रेट गिरने लगी.
वैज्ञानिक इसे ‘नेगेटिव डेमोग्राफिक फेज’ कह रहे हैं. इसका मतलब है कि अब ज्यादा लोग होने का मतलब ज्यादा तरक्की नहीं, बल्कि संसाधनों पर ज्यादा दबाव है. अगर यही हाल रहा तो 2060 या 2070 तक दुनिया की आबादी 12.4 अरब तक पहुंच जाएगी, जो कि तबाही का चरम बिंदु हो सकता है.
क्या धरती की सहनशक्ति जवाब दे चुकी है?
वैज्ञानिकों ने ‘कैरिंग कैपेसिटी’ यानी वहन क्षमता का एनालिसिस किया है. सरल शब्दों में कहें तो धरती कितने लोगों को ढंग से पाल सकती है? जवाब डराने वाला है. प्रोफेसर ब्रैडशॉ का कहना है कि धरती की असल क्षमता आज की 8.3 अरब आबादी को पालने की भी नहीं है. हम आज जो ऐश-ओ-आराम की जिंदगी जी रहे हैं, वह सिर्फ इसलिए मुमकिन है क्योंकि हम करोड़ों साल पुराने संसाधनों और फॉसिल फ्यूल को आग लगा रहे हैं. अगर हम पर्यावरण की लिमिट में रहकर एक सुरक्षित और अच्छी लाइफस्टाइल जीना चाहते हैं, तो धरती केवल 2.5 अरब लोगों के लिए ही सही है. यानी हम अपनी लिमिट से तीन गुना ज्यादा बोझ बनकर जी रहे हैं.
फॉसिल फ्यूल ने कैसे आंखों पर पट्टी बांधी?
सवाल उठता है कि अगर क्षमता कम थी, तो हम इतने ज्यादा कैसे हो गए? इसका श्रेय जाता है ‘सस्ते ईंधन’ को. कोयले, पेट्रोल और गैस की वजह से हमने फूड प्रोडक्शन, ट्रांसपोर्ट और खाद बनाने की नई तकनीकें विकसित कर लीं. इससे हमने प्रकृति की सीमाओं को कुछ समय के लिए धोखा दे दिया. लेकिन यह कर्ज बहुत महंगा पड़ने वाला है. इसी वजह से क्लाइमेट चेंज, प्रदूषण और जैव विविधता का विनाश हो रहा है. हम भविष्य की पीढ़ी का हिस्सा आज ही खर्च कर रहे हैं. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई अपनी जमा पूंजी खत्म करके उधार पर शाही जिंदगी जी रहा हो.
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दीपक वर्मा एक दशक से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वह News18 हिंदी के डिजिटल न्यूजरूम में डिप्टी न्यूज़ एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. दीपक मुख्य रूप से विज्ञान, राजनीति, भारत के आंतरिक घटनाक्रमों औ…और पढ़ें





