आखिर हम कितने लोकतांत्रिक हैं

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संजीव शुक्ल

हमारे देश में लोकतंत्र का इतिहास बहुत पुराना रहा है। लोकतांत्रिक इतिहास की यह अवधि लगभग 600 ईसा पूर्व तक जाती है। हमारे यहाँ लोकतंत्र और राजतंत्र दोनों समान रूप से लगभग साथ-साथ विकसित हुए और फले-फूले।

लोकतंत्र हिमालय की तलहटी और पंजाब के क्षेत्र में फलाफूला तो राजतंत्र गंगा के मैदानी इलाकों में। शाक्य,मल्ल, कौलीय, यादव तथा वृज्जि आदि जन या जनों के संघ अपनी प्रकृति में लोकतांत्रिक थे। यह उल्लेखनीय है कि महावीर और बुद्ध जैसे क्रांतिकारी धार्मिक आंदोलन के प्रणेता क्रमशः ज्ञात्रिक जन और शाक्य जन में ही जन्मे थे, जोकि लोकतांत्रिक जन थे। हालांकि लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास की चमक बाद की शताब्दियों में धुंधली हुई और राजतंत्रों को महत्ता प्राप्त हुई।


 वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप औपनिवेशिक शासन के मध्य विकसित हुआ है। यह शासक और शासित तथा शोषक व शोषित के मध्य चले लम्बे संघर्ष से उद्भूत है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था उन मानवीय मूल्यों की थाती है, जो व्यक्ति के आत्मनिर्णय के अधिकार को समाज के कल्याण की संगति के संदर्भ में समाज में गौरवशाली स्थान देने की प्रखर पैरोकारी करते हैं। 


पर प्रश्न उठता है कि लोकतंत्र से इतना पुराना परिचय होने के बावजूद और उसके लिए इतनी कुर्बानियाँ देने के बाद आज हम वास्तविक अर्थों में कितने लोकतांत्रिक हैं? या इसे ऐसे कहें कि हम सच्चे अर्थों में लोकतंत्र को कितना जी पाए हैं ??


 लोकतंत्र जन-विमर्श के द्वारा सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का नाम है, न कि एक खास दिशा में जनसमूह को बहलाकर वांछित निर्णय हासिल करने की प्रक्रिया का नाम। आज बड़ी धूर्तता से तथ्यों को तोड़मरोड़कर खास नरेटिव सेट किये जाते हैं। कभी भावनाओं को भड़काकर तो कभी तुष्टिकरण के द्वारा वोट हासिल किए जाते हैं। अंधी भावनाओं के उबाल ने जन समूहों को भीड़ में तब्दील करके रख दिया है, जिसका अपना कोई विवेक नहीं। यह भीड़ उस भेड़ों के झुंड के सदृश है जो सिर्फ़ अंधानुकरण करना जानती हैं।


    लोकतंत्र में बहुमत का आदर होता है, पर अल्पमत के रूप में विपरीत या विरोधी धारा को बांधा नहीं जाता। वह भी समानांतर उन्मुक्त रूप से बहती रहती है। वाद-प्रतिवाद से ही संवाद जन्मता है। आधुनिक वैश्विक राजनीति में भले ही लोकतंत्र एक आधुनिक अवधारणा मानी जाती रही हो, पर भारत के संदर्भ में यह प्रशासनिक ढांचे से इतर बहुत पहले से भारतीयों की जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा रही है।

यहां तो ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाली दर्शन-धारा को भी लोगों ने शांत भाव से सुना है। लोकतांत्रिक मनःस्थिति का इससे बड़ा और क्या प्रमाण होगा कि एक धार्मिक भावभूमि पर ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने वाली विचारधारा को भी सहज भाव से सुना जाय?? हमें खुशी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता पश्चात भी हमने लोकतांत्रिक मूल्यों का न केवल सम्मान किया अपितु उन्हें अपने आचरण में उतारा। 


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद एक वह समय था जब विरोधी विचारों को न केवल सुना जाता था अपितु उसे प्रोत्साहित किया जाता था। कई बार विपक्ष के बड़े नेताओं की प्रखर मेधा से संसदीय विमर्श को सम्पन्न करने की इच्छा से उनको संसद में पहुंचाया जाता था। पूर्व में कई बार ऐसा हुआ कि तत्कालीन सत्ता पक्ष  कांग्रेस द्वारा प्रखर मेधा के धनी विपक्षी नेताओं को सम्मान देते हुए उनके खिलाफ चुनाव में कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं उतारा गया। 

आज के चरित्र-हनन के दौर में यह बताना जरूरी हो जाता है कि 1962 में नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले लोहिया चुनावी रैलियों को संबोधित करने के बाद प्रायः आनन्द भवन जाया करते थे। चुनाव में नेहरू ने लोहिया के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोला। और बोलना तो दूर रहा, उल्टे उन्होंने खुद का प्रचार तक नहीं किया। वैचारिक भिन्नता अपनी जगह थी और आपसी सौहार्द अपनी जगह। 

इसी तरह सुभाषचन्द्र बोस जोकि गांधी और नेहरू की राजनीतिक शैली के प्रखर आलोचक थे, ने अहिंसा के स्थापित मानकों से असहमत हो अन्ततः 1939 में कांग्रेस को छोड़ दिया। आपने एक नई पार्टी ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ बना ली। पर इस मुखर असहमति के बावजूद उन्होंने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में गांधी और नेहरू को लेकर कभी कोई कटु टिप्पणी नहीं की।

उल्टे सशस्त्रक्रान्ति की शुरूआत करते समय सुभाष जी ने रेडियो पर राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में गांधीजी से आशीर्वाद की कामना की और उन्हें राष्ट्रपिता की संज्ञा दी। आजाद हिंद फौज में आपने नेहरू और मौलाना आजाद के नाम से रेजिमेंट भी गठित की। यह बहुत बड़ी बात थी। अपने समकालीन विरोधी नेताओं को इतना ज्यादा सम्मान देना चकित कर जाता है!!

तो यह था बड़े नेताओं का एक-दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण व्यवहार। इससे इन नेताओं के आपसी सम्बन्धों की ऊष्मा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। अल्पमत या भिन्न मत को स्वीकार्यता के साथ सम्मान देना लोकतंत्र की मूल चेतना को रेखांकित करता है। लोकतांत्रिक मनःस्थिति सद्भाव को जन्म देती है। असली लोकतंत्र यही है। यह व्यवहार बताता है कि हमारे ये नायक न केवल उच्च नैतिक मूल्यों से संचालित होते थे अपितु अपने निजी जीवन में भी लोकतांत्रिक भाव को पूरे मन से जीते थे।


  पर आज स्थितियां दूसरी हैं। हम सामने वाले को सुनना ही नहीं चाहते। हम प्रारंभ में ही उसके भाव को लांक्षित करना शुरू कर देते हैं। देशद्रोही का बिल्ला थमाकर उसको तत्काल देशनिकाला दे दिया जाता है।  उसको वहीं पर रोककर हम अपने वाग्वैदग्ध्य की घोषणा कर देते हैं। यह वैचारिक स्खलन ऊपर से नीचे की ओर आया है। स्वार्थी नेतृत्व ने बहुत चालाकी से समाज में जहर भर दिया।

भावनाओं के व्यापारी जब-जब सत्ता में आए हैं, तब-तब आदर्शवाद और श्रेष्ठतावाद की आड़ में तानाशाही को बढ़ावा दिया गया। हिटलर, मुसोलिनी की यही नीति थी। ऐसे में संचार तंत्र सत्ता पक्ष का बंधुआ मजदूर जैसा हो जाता है। मीडिया सत्ता के इशारों पर नर्तन करता है। वह सत्ता पर सवाल खड़े करने के बजाय उसकी विरुदावलि गाता है। मीडिया सत्ता के प्रवक्ता की भूमिका के रूप में नज़र आने लगता है। ऐसे में सत्ता और मीडिया दोनों की जुगलबंदी देखते बनती है। मानों दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों। प्रशंसा के पुल बांधे जाते हैं;

एक अद्भुत आभामण्डल की गढ़न की जाती है!!! न भूतो न भविष्यति ……  दिनानुदिन घटते रोजगार के बावजूद जनमन आह्लादित रहता है !!! मन बिंधा रहता है एक बुने गए मायाजाल में, जहाँ कहीं कोई कमी नहीं। नेतृत्व पर आँख बंद करके विश्वास किया जाता है। प्रभाव में कैसा अभाव ????  यह  एक तरह से आभासी लोकतंत्र है। यहाँ लोकतंत्र नहीं होता बस उसका आभास मात्र होता है। लोगों को लगता है कि उनसे राय ली जा रही है, पर ऐसा होता नहीं, बल्कि नेतृत्व और उसके अनुषंगी संगठनों के द्वारा लोगों को एक खास विचारधारा में दीक्षित किया जाता है।

 
   कहने का मतलब आज हम लोकतंत्र में तो जीते हैं, पर लोकतंत्र को नहीं जीते! हम समाज में रहते तो हैं, मगर सामाजिकता को नहीं जीते! आज लोकतंत्र हंगामों का महोत्सव बनकर रह गया है। हमने लोकतंत्र को सत्ता प्राप्ति का मात्र एक जरिया बना दिया।  सत्ता के लिए एक वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया गया। काल्पनिक भय खड़े किये गए।

कभी किसी का तुष्टिकरण तो कभी किसी का…..   सर्वस्वीकार्यता की जगह गुटबंदी को आसान समझा गया। कभी मण्डल के रूप में जातियों को लामबंद किया गया तो कभी  धार्मिक विभेद को सत्ता-प्राप्ति की सीढ़ी के रूप में देखा गया। इसे सिर्फ़ एक पार्टी का मसला न समझा जाए। असल बात तो यह है कि इसमें वो पार्टियां भी शामिल हैं जो अपने को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं। किसी भी पार्टी ने पंथनिरपेक्षता को ईमानदारी से नहीं अपनाया। क्या जातीय तुष्टिकरण की आड़ में वोटों का ध्रुवीकरण नहीं किया गया ??
आज अपनी कमियों को, अपनी असफलताओं को तथा अपनी कट्टरता को सामने वाली की कमियों, असफलताओं और कट्टरता के आधार पर जस्टीफाई  करने की कोशिश की जाती है। यह खुद को दोषमुक्त करने का बहुत आसान तरीका है।


कट्टरता किसी की भी हो वह अच्छी नहीं हो सकती। आजकल कट्टरता को पौरुषेय की निशानी समझा जाने लगा है। वस्तुतः यह वैचारिक स्खलन है। हमने नफरतों का इस्तेमाल किया है अपने राजनीतिक लाभ के लिए। हमने नफरतों का व्यापार किया है। सत्ता मिले चाहे जैसे मिले। 

 किसी ने क्या खूब लिखा है—
“राजा की जान यूं बसी तोते की जान में।नफ़रत बची रहे तो हुकूमत बची रहे”  इस प्रवृत्ति को बदलने की जरूरत है, ताकि लोकतंत्र को हम उसके मूलस्वरूप में ला सकें।

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