अठावले को नमन

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संजीव शुक्ल

अपनी कविता से तुकबंदी साहित्य को शिखर पर ले जाने वाले काव्य-जगत के कोहिनूर श्री अठावले अब भारतीय लोकतंत्र को भी ऊँचाईयों पर ले जाएंगे।

लोकतंत्र को ऊँचाईयों पर ले जाने की एक तरह से उन्होंने ज़िद-सी पकड़ ली है और जब उन्होंने ज़िद पकड़ ही ली है तो फ़िर इसमें हम-आप क्या कर सकते हैं??

आप कई गुणों को धारते हैं, उदाहरण के तौर पर आप  हवा के रुख के आधार पर भावी सत्ता-समीकरणों का पता लगा लेते हैं। बिल्कुल रडार समझिए इन्हें, बस बादल बीच में न फटै।

आप दलों के मोह-जाल से परे सिर्फ़ एक परमतत्व ‘सत्ता’ के उपासक हैं। इस तरह दलों के मामले में आपको विदेह कहा जा सकता है।

इनको देखकर के पूरी की पूरी पीढ़ी दो तरह से प्रेरित हुई;  ख़ासतौर से नए लौड़े-लपाड़े दुःसाहस की सीमा तक आशावादी हो गए हैं। 

प्रेरणा का एक क्षेत्र तो उन लोगों का है जो बहुत चाह करके भी कविता नहीं रच पा रहे थे क्योंकि उन्हें लिखने-पढ़ने और कविता रचने के बेसिक फार्मूलों को जानने से हमेशा से ही परहेज रहा है,सो उनके लिये कविता लिखना एक दुर्लंघ्य पहाड़ जैसा था जिस पर चढ़ने के अपने ख़तरे थे, सो यह काम उन्होंने दूसरों के लिये रख छोड़ा था।

खुद आप नीचे खड़े होकर ताली बजाते थे।  क्या यह साहित्यिक अत्याचार का विषय नहीं है कि दोहा, चौपाई, सोरठा और छंदों की मात्रा आदि की दुरूहता ने पता नहीं कितने लोगों को कवि बनने से रोका ??

कितनों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ताला जड़ दिया ?? 

ऐसा करके हमने साहित्यिक जगत में एक शून्यता पैदा कर दी है। हमने ज्ञानपीठ हड़पने वालों की एक रचनाधर्मी-नस्ल ही  ख़तम कर दी । पर अब ऐसा नहीं है। अठावले को देखकर प्रेरित-पीढ़ी की रचनाधर्मिता बल्लियों उछाल मार रही है।

अब वह इस फील्ड में भी अन्य कवियों से दो-दो हाथ करने पर उतारू है। प्रेरित पीढ़ी के लोगों का विश्वास है कि ‘बलम पिचकारी’ टाइप के गाने तो हम भी लिख सकते हैं।

इसमें कौन सी ख़ास बात??? वो खुद में भविष्य का मजरूह सुल्तानपुरी बनने की संभावनाएं देखने लगें हैं। आखिर ऐसा हो भी क्यों न ???

उनके इस तरह के सोचने और मानने की वज़ह बनती है।  उनके इन सपनों को पँख दिए हैं, अठावले की आशु कविता ने!!

प्रेरणा का आधार अठावले की आशु रचनाधर्मिता है।

नमूना के तौर पर उनकी इस पंक्ति को उठाया जा सकता है, जिसमें वह यह कहते हुए पाए जाते हैं कि “एक देश का नाम है रोम, लेकिन हमारे लोकसभा अध्यक्ष बन गये हैं बिरला ओम”…….

क्या ग़ज़ब की तुकबंदी भरी पंक्ति है और क्या अद्भुत लालित्य है !!!!

नये लड़के उनके इसी तुकबन्दित्व पर मर मिटे !!   

अब आते हैं, प्रेरणा के दूसरे क्षेत्र में। दूसरा क्षेत्र राजनीति का था, जहाँ जनसेवा का शुष्क भावक्षेत्र उनको उसमें जाने से रोकता था।

कई बार हवा के रुख़ को भाँपने में माहिर खिलाड़ी भी इसी जनसेवा के चक्कर में राजनीति में पैर आगे नहीं बढ़ा सकें।

कुछ लोग आत्मप्रगति की भावना से आगे बढ़े भी तो लोकलाज तथा देश के कानून ने उन्हें बहुत आगे तक जाने न दिया।

ख़ैर अब अठावले और उन जैसे और बावलों ने हया की यह दीवार गिरा दी।

इनसे प्रेरित होकर अब नए लड़के-लड़कियां हवा के रुख़ को भाँपकर सत्ता समीकरणों को साधने का प्रशिक्षण लेने लगे हैं।

इसमें पीढ़ियों तक के संवर जाने की व्यवस्था है। इस क्षेत्र में प्रगति की अपार संभावनाऐं हैं जो अब उनको बेचैन करने लगीं हैं। वह ‘उठो, जागो और आगे बढ़ो’ में विश्वास करने लगे हैं। 

अठावले की इस प्रतिभा और योगदान के प्रति हम सभी नमित हैं। 

वास्तव में, राजनीति के ऐसे संतों, जो हवा के रुख़ को देखकर पाला बदलने में माहिर हों, को शत-शत नमन !!! विनम्र श्रद्धांजलि ऐसे रहनुमाओं को

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