नमामि फेसबुकम

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संजीव शुक्ल

आजकल सोशल मीडिया का दौर है,जिसे देखो मीडिया में छाया हुआ है। हर कोई सोशल मीडिया के जरिये ही अपनी बात कहना चाहता है।

ठीक वैसे ही जैसे कुछ नेता भाई लोग सब कुछ कह चुकने और कहीं न सुने जाने के बाद अपनी बची-खुची बचाने के लिये पार्टी फोरम पर अपनी बात कहने की बात कहते हैं।

यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार है, उसकी चरम उपलब्धि है। फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिये बात बहुत असरदार हो जाती है। लोग-बाग सामान्य बात को भी बहुत गम्भीरता से लेते हैं।

और बात कितनी वज़नदार है, इसका पता तब चलता है जब ठकाठक लाइक्स आने शुरू हो जाते हैं, हालांकि इसमें लोग बात से ज़्यादा महत्व बात को लिपिबद्ध करने वाले आदमी को देते हैं।

कभी-कभी  लोग लोकलाज में इसलिए लाइक कर देते हैं ताकि कोई यह न समझे कि “फ़लाने तो बात को समझै नहीं पाये”।

कुछ भी हो लोकतंत्र में संख्या-बल का अपना महत्व होता है। इसलिए व्यक्ति की लोकप्रियता का अंदाजा उसकी पोस्ट पर लाइक्स और कमेंट्स से पता चलता है।

आजकल कुछ भाई लोग अपनी बात कहने के लिए फेसबुक वग़ैरह का उपयोग बाकायदा धार्मिक अनुष्ठान के तौर पर करते हुए पाये जाते हैं। एक भाईजी अपनी उम्र के 58वें पड़ाव पर अपनी पोस्ट में यह घोषणा करते हैं कि ‘आज मेरा जन्मदिन है, देखते हैं, कौन-कौन  मुझे wish करता है।’ 

ऐसे में कौन माई का लाल होगा जो comments नहीं करेगा।

लाइक्स और कमेन्ट्स की भीख मांगने वाले भाइसाहबों की पोस्ट पर यदि मनचाहे comments आ जायें तो समझिये कि उनका पृथ्वी पर आना सफल हो गया और कहीं अगर किसी उदार आदमी ने उनकी पोस्ट को शेयर कर दिया तब तो आप यक़ीन मानिये कि उन्होंने सदेह मोक्ष प्राप्त कर लिया।

वो तो भला हो फेसबुक और व्हाट्सएप का जो लोगों को ऐसा मंच देता है जहां पर वो online wishes मांग सकते हैं, नहीं तो ऐसे लोग जीते जी मर जाते……

यह भी हो सकता है कि यदि उन भले मानुष के जन्मदिन पर कोई wish न करे तो संभव है वो अगले साल अपने जन्मदिन पर केक काटने के बावजूद 58 के ही बने रहें और 59वें साल में न पहुंच पायें।

उन साहब की बाढ़ वही पर रुक जाएगी। इसी तरह कुछ भाई लोग अपनी वाल पर अपनी ड्यूटी से सम्बंधित यह बताते हुए पाए जाते हैं कि आज हमने फ़लाना किया, आज हमने ढ़काना किया। अरे भाई रोज करिए, आज ही क्यों???? ये तो आपकी ड्यूटी है। 

ख़ैर ….आजकल अपडेट का जमाना है, भई जमाने के साथ चलना है तो अपडेट होना ही पड़ेगा। कुछ उत्साही भाई लोग पल-पल की  खबर देते हैं और कोशिश करते हैं कि सबसे पहले उन्हीं से लोगों को जानकारी हो।

कई बार तो ऐसे लोग नामचीन हस्तियों के दिवंगत होने की घोषणा भी कर देते हैं, लेकिन बाद में पता चलता है कि उन लोगों ने मरने से इंकार कर दिया और उनकी आत्मा अभी भी उसी काया में विद्यमान हैं। 

इधर एक नया ट्रेंड चला है, पता नहीं विदेशों में अभी पहुंचा या नहीं। ट्रेंड है …..  दादू,दद्दू,नानी या फलां-फ़लां जो बिलकुल अभी-अभी दुनिया से कूच कर गये हैं (पता नहीं ठीक तरह से कूच कर भी पाये हैं या नहीं) की फ़ोटो पोस्ट कर ये बताना कि ये अब हमारे बीच नहीं रहे, बहुत लंबी उमर पायी।

ऐसे में लोगों के सामने  सबसे बड़ा खतरा यह होता है कि कोई दूसरा इस ताजी सूचना को पहले पोस्ट करके बाजी अपने हाथ न मार ले जाय। हद है !!!! 

कोई कायदे से मर भी न पाए और इधर पोस्ट तैयार हो गयी। पोस्ट होते ही दुःख भरे संदेशों की बाढ़ सी आ जाती है।

और तो और पन्द्रह-बीस लाइक्स भी तुरंत ही आ जाते हैं। घर-परिवार वाले भी आज ही जान पाए कि हमारे दद्दू इतने लोकप्रिय थे। अब आप ही बताइये ऐसे में अगर कोई खुद्दार आदमी मरने के अपने प्रोग्राम में तब्दीली भी करना चाहे तो लोकलाज के चलते न कर पाये।

भई अपनी खुद्दारी से बग़ावत करके कोई व्यक्ति जिंदा रह भी कैसे सकता है। ग़नीमत है बात सेल्फी तक नहीं पहुंची अभी ।   

आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप पर प्रखर चिंतक और विधिविशेषज्ञ थोक भाव में पाए जाते हैं। कूटनीति में यहां सब चाणक्य के चाचा-दादा हैं।

अगर कोई पोस्ट ठीक नहीं लगी तो निःसंकोच भाव से गाली-फक्कड़ी की जा सकती है; बस आपके अंदर इच्छाशक्ति होनी चाहिए। इस प्लेटफॉर्म पर आकर के ही पता चलता है कि हम लोग वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कितना आगे बढ़ चुके हैं!!!! 

निश्चित रूप से अन्य देश हमारी इस प्रगति पर ईर्ष्या करते होंगे। अब ईर्ष्या करें तो करें,पर इसके लिए हम अपनी प्रगतिशीलता पर विराम तो नहीं लगा सकते न…. कुलमिलाकर सोशल मीडिया ने हमारी अंतर्निहित भावनाओं व योग्यताओं को उभरने का मौका दिया है;

एक मंच प्रदान किया है जहां हम अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं।

https://hindiblogs.co.in/contact-us/  

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