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Abhishek Manu Singhvi Vs Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में प्लास्टिक बोतलों पर चेतावनी लेबल विवाद की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी से कहा कि घर जाकर अपनी पत्नी से पूछिए… कोर्ट का इशारा आम लोगों में बढ़ती प्लास्टिक के प्रति जागरूकता की ओर था और जस्टिस ने याचिका खारिज कर दी.
अभिषेक मनु सिंघवी एक केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए
नई दिल्ली. प्लास्टिक बोतलों में बिकने वाले पानी और पैक्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल लगाने को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक दिलचस्प और तीखी टिप्पणी सुनने को मिली. सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी से कहा कि मिस्टर सिंघवी, आप अपने घर जाकर अपनी पत्नी से इस बारे में पूछिए तब आपको समझ आ जाएगा. यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने उस समय की जब प्लास्टिक से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों पर बहस चल रही थी.
मामला क्या है?
यह पूरा मामला मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ा है जिसमें फूड सेफ्टी और स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया और अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया गया था कि
– PET बोतलों में बिकने वाले पानी
– प्लास्टिक में पैक चीनी और नमक पर लाल रंग में चेतावनी लिखी जाए. इनमें माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकते हैं. इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी
कोर्टरूम में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ए.एम. सिंघवी ने दलील दी कि इस विषय पर अभी और रिसर्च की जरूरत है, बिना ठोस वैज्ञानिक आधार के चेतावनी देना गलत होगा और इससे उपभोक्ताओं में डर और भ्रम पैदा होगा. उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की चेतावनी से कंपनियों की छवि पर असर पड़ेगा और यह ‘अनावश्यक घबराहट’ पैदा करेगी.
कोर्ट ने क्यों कहा पत्नी से पूछिए?
कोर्ट ने सिंघवी की दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर चेतावनी सिर्फ सावधानी के तौर पर दी जा रही है तो इसमें दिक्कत क्या है? लोगों को जागरूक करने में कोई बुराई नहीं है. इसी संदर्भ में जज ने कहा कि आप घर जाकर अपनी पत्नी से पूछिए… लोग अब प्लास्टिक बोतलों का इस्तेमाल कम कर रहे हैं. इस टिप्पणी का मकसद यह बताना था कि आम लोगों में पहले से ही प्लास्टिक को लेकर चिंता बढ़ रही है.खासकर घरों में रोजमर्रा के फैसलों में यह जागरूकता दिख रही है इसलिए चेतावनी देना ‘असामान्य’ नहीं, बल्कि समाज की सोच के अनुरूप है.
कोर्ट का बड़ा संदेश
बेंच ने साफ संकेत दिया कि यह मामला सिर्फ तकनीकी या कानूनी नहीं बल्कि जन स्वास्थ्य और जागरूकता से जुड़ा है. अगर संभावित खतरे हैं तो लोगों को जानकारी देना जरूरी है. सावधानी बेहतर है और इस सिद्धांत पर कोर्ट ने जोर दिया. कोर्ट ने यह भी कहा कि आप एक छोटी सी चेतावनी देने से इतना क्यों कतरा रहे हैं? जनता को जागरूक होने दीजिए.
याचिका का क्या हुआ?
लंबी बहस के बाद सिंघवी ने अपने मुवक्किलों से निर्देश लेकर याचिका वापस लेने का फैसला किया. कोर्ट ने कहा कि याचिका को वापस ली गई मानकर खारिज कर दिया. साथ ही यह छूट दी कि वे हाईकोर्ट में जाकर आदेश को चुनौती दे सकते हैं.




