ECI bans Exit Polls from 9 to 29 April: अगर आप एग्जिट पोल से जुड़ा कोई भी काम करते हैं. चाहे मीडिया में हों या सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं तो यह खबर आपके लिए है. चुनाव आयोग ने इस बार एग्जिट पोल को लेकर बेहद सख्त फैसला लिया है. 9 अप्रैल से लेकर 29 अप्रैल तक एग्जिट पोल पर पूरी तरह बैन रहेगा. यानी इस दौरान कोई भी यह नहीं बता पाएगा कि किसकी सरकार बन रही है. और कौन पीछे चल रहा है. आयोग ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ निर्देश नहीं, बल्कि कानून है. अगर कोई भी इस नियम को तोड़ता है, तो उसे दो साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में चुनावी कवरेज करने वालों को खास सतर्क रहने की जरूरत है.
20 दिन तक एग्जिट पोल पर पूरी तरह लगी ब्रेक
चुनाव आयोग के आदेश के मुताबिक 9 अप्रैल 2026 सुबह 7 बजे से 29 अप्रैल 2026 शाम 6:30 बजे तक एग्जिट पोल पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे. इस दौरान टीवी, अखबार, वेबसाइट या सोशल मीडिया, कहीं भी एग्जिट पोल नहीं दिखाए जा सकेंगे.
उल्लंघन पर सीधा एक्शन
आयोग ने साफ कहा है कि यह आदेश जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126A के तहत लागू किया गया है. अगर कोई संस्था या व्यक्ति इस नियम को तोड़ता है, तो उसे दो साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों सजा हो सकती है.
48 घंटे पहले प्रचार भी पूरी तरह बंद
सिर्फ एग्जिट पोल ही नहीं, बल्कि मतदान खत्म होने से 48 घंटे पहले तक किसी भी तरह की चुनावी प्रचार सामग्री के प्रसारण पर भी रोक लगाई गई है. इसका मकसद मतदाताओं को बिना किसी प्रभाव के वोट डालने का मौका देना है.
डिजिटल प्लेटफॉर्म भी आए दायरे में
अब सिर्फ टीवी चैनल ही नहीं, बल्कि यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म भी इस नियम के दायरे में आते हैं. कोई भी यूजर एग्जिट पोल से जुड़ी जानकारी शेयर करता है, तो उस पर भी कार्रवाई हो सकती है.
क्यों एग्जिट पोल पर लिया गया इतना सख्त फैसला?
चुनाव आयोग का मानना है कि एग्जिट पोल मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं.
अगर पहले चरण के बाद ही नतीजों का अनुमान सामने आ जाए, तो बाकी चरणों के वोटर्स पर असर पड़ सकता है. इसी को रोकने के लिए यह सख्त कदम उठाया गया है.
चुनाव आयोग का साफ संदेश
आयोग ने साफ कर दिया है कि चुनाव की निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं होगा. हर नियम का पालन जरूरी है, वरना कार्रवाई तय है. आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भी निर्देश दिए हैं कि वे स्थानीय स्तर पर इस नियम का पालन सुनिश्चित करें. साथ ही मीडिया संगठनों को लिखित रूप में सूचना भेजी जा रही है. कई मीडिया हाउस पहले ही अपनी लीगल टीमों को एक्टिव कर चुके हैं ताकि कोई गलती न हो. विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम सही दिशा में है. पिछले कुछ चुनावों में एग्जिट पोल के नतीजों ने काफी विवाद खड़ा किया था. कभी नतीजे सटीक आए तो कभी पूरी तरह गलत साबित हुए. इससे मतदाताओं में भ्रम फैला और कुछ जगहों पर हिंसा जैसी घटनाएं भी हुईं. इसलिए आयोग अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहता.





