संजीव शुक्ला

एक व्यंग्य

संजीव कुमार शुक्ला ये बग्घा ट्रम्प शुरू से लकड़बग्घा था। इसकी चालाकी तो अब समझ में आई जब इसने अपने सारे काम निपटाने...

दीवारों की अहमियत

दीवार शब्द सुनते ही पता नहीं क्यों दिल बैठने सा लगता है; अजीब-अजीब से ख़यालात दिल में आने लगते हैं। लगता है सारी...

साम्प्रदायिकता और हम

संजीव कुमार शुक्ला आज जबकि पूरा देश, पूरा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है, हमको अपने देश में कोरोना के समानांतर...

लड़ाई के सुर पर जूते की संगत

संजीव कुमार शुक्ला मेरा मानना है कि लड़ने के लिये मुद्दों की जरूरत नहीं होती बस आपके अंदर अदम्य इच्छाशक्ति होनी चाहिए।...

आज की पत्रकारिता

संजीव कुमार शुक्ला पत्रकारिता के अपने मानक होते हैं। वह सोद्देश्यपरक होती है। लोकमंगल की कामना, उसका अभीष्ट है। मानवीय मूल्यों की...

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