हिन्दी साहित्य

“इस हरे-भरे देश में चारे की कमी नहीं है, -घोटाले

जो अखबारों में छपते रहते हैं, उनके यहाँ छापा पड़े, यह ठीक नहीं। और छापेमारी तो फ़िर गनीमत है; कई बार तो देखते-देखते उनको...

हनुमान जी की जाति.

अब हनुमानजी भी अनुसूचित जाति में दर्ज़ हुए .... हनुमानजी की सारी होशियारी निकल गई... हनुमानजी सोच रहे थे कि हम नहीं बताएंगे तो क्या...

नमन उन घोटालेबाजों को..

जिस तरह ईश्वर होता तो है, पर दिखाई नही देता, ठीक उसी तरह घोटाले भी होते तो हैं पर दिखते नहीं। दिल नमामि घोटाले...

एक परंपरा का फ़िर से उद्भव

संजीव कुमार शुक्ला हमारी परंपरा में शाप देने की एक उत्कृष्ट व महती परंपरा रही है। "देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई" की हमारे...

“दंगों के लिए अभिशप्त हम”

संजीव कुमार शुक्ला इन दंगो ने देश की शक़्ल बिगाड़ के रख दी है। ये वो ज़ख्म हैं जिनको भरने में सदियां...

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