CJI Surya Kant News: मंदिर-मस्जिद में एंट्री, महिलाओं का खतना… सबरीमाला विवाद से खुला पिटारा, सीजेआई सूर्यकांत ने बनाई 9 जजों की बेंच, अब होगा फैसला

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आस्था बनाम महिलाओं के अधिकारों की जंग पर अब सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई का मंच तैयार हो गया है. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI Surya Kant) ने महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और आस्था के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. उन्होंने नौ जजों की एक विशेष संविधान पीठ का गठन किया है, जो देश के इस सबसे संवेदनशील सामाजिक-धार्मिक विवादों पर फैसला करेगी. खास बात यह है कि इस पीठ में अलग-अलग धर्मों के न्यायाधीशों के साथ एक महिला जज को भी शामिल किया गया है, ताकि फैसले की निष्पक्षता और व्यापकता पर कोई सवाल न उठे.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह नौ जजों की पीठ 7 अप्रैल से उन मामलों की सुनवाई शुरू करेगी, जो सीधे तौर पर महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के अधिकार और परंपरागत मान्यताओं के टकराव से जुड़े हैं.

9 जजों की संविधान पीठ में कौन-कौन शामिल?

इस बेंच में जस्टिस बीवी नागरत्ना भी शामिल हैं, जो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट की इकलौती महिला जज हैं और अगले साल देश की पहली महिला चीफ जस्टिस बनने वाली हैं. उनके अलावा जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस अरविंद कुमार इस पीठ का हिस्सा होंगे.

सबरीमाला विवाद से शुरू हुआ पूरा मामला

दरअसल, यह पूरा विवाद साल 2018 में सबरीमाला विवाद पर आए फैसले के बाद शुरू हुआ था. सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी. यह परंपरा भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ मानने की आस्था से जुड़ी हुई थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी थी.

आस्था बनाम महिला अधिकार की जंग

इस फैसले के बाद देशभर में बहस छिड़ गई और कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं. इसके साथ ही अन्य धार्मिक प्रथाओं को भी चुनौती मिलने लगी. इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ (महिला जननांग विकृति) की प्रथा को खत्म करने और पारसी महिलाओं को अगियारी (फायर टेंपल) में प्रवेश देने जैसे मुद्दे शामिल हैं. केंद्र सरकार ने भी सबरीमाला फैसले की समीक्षा की मांग का समर्थन किया था.

साल 2019 में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने मूल फैसले को बरकरार रखते हुए इन व्यापक मुद्दों को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था. इसके बाद सीजेआई बने जस्टिस एसए बोबडे ने इस मामले को नौ जजों की संविधान पीठ को सौंपा था, ताकि यह तय किया जा सके कि जब धार्मिक आस्था और मौलिक अधिकारों में टकराव हो तो किसे प्राथमिकता दी जाए.

अब क्या करेगा सुप्रीम कोर्ट?

अब सीजेआई सूर्यकांत द्वारा गठित नई नौ सदस्यीय पीठ इसी जटिल सवाल का समाधान तलाशेगी. यह पीठ पहले उन सिद्धांतों और दिशानिर्देशों को तय करेगी, जिनके आधार पर भविष्य में ऐसे मामलों का निपटारा किया जाएगा. इसके बाद जैसे सबरीमाला, मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश या अन्य धार्मिक प्रथाओं से जुड़े अलग-अलग मुद्दों को इन दिशानिर्देशों के आधार पर तय करेंगी.

इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय न्यायपालिका के लिए एक अहम मोड़ माना जा रहा है, क्योंकि यह सिर्फ एक मंदिर या परंपरा का मामला नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि आधुनिक संविधान में महिलाओं के समान अधिकार और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ कानून बल्कि समाज की दिशा भी तय कर सकता है.



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