श्रीमंत बाजीराव की पुण्यतिथि -Death anniversary of shrimant bajirao

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श्रीमंत बाजीराव पेशवा की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 में हुई जिसके बाद 28 अप्रैल को श्रीमंत बाजीराव पेशवा को उनकी पुण्यतिथि के रूप में याद किया जाता है।

श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम की इस बार 278 वीं पुण्यतिथि 28 अप्रैल को मनाई जाएगी।

महान योद्धा श्रीमंत बाजीराव-

पेशवा बाजीराव प्रथम महान सेनानायक थे। वे 1720 से 1740 तक मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज के (पेशवा) प्रधानमंत्री रहे।

पेशवा बाजीराव का जन्म चित्ताबन कुल के ब्राह्मण परिवार में पिता बालाजी विश्वनाथ और माता राधाबाई के घर में हुआ था।

उनके पिताजी मराठा छत्रपति शाहूजी महाराज के प्रथम प्रधानमंत्री थे। पेशवा बाजीराव को ‘बाजीराव बल्लाळ’ तथा ‘थोरले बाजीराव’ के नाम से भी जाना जाता है।

बचपन से ही बाजीराव को घुड़सवारी करना, तीरंदाजी, तलवार, बल्ला, बनेठी लाठी आदि चलाने का शौक था।

13-14 वर्ष की खेलने की आयु में बाजीराव अपने पिताजी के साथ घूमते थे। उनके साथ घूमते हुए वे दरबारी चालों व रीति-रिवाजों को आत्मसात करते रहते थे।

यह क्रम 19-20 वर्ष की आयु तक चलता रहा। जब बाजीराव के पिता का अचानक निधन हो गया तो मात्र 20 वर्ष की आयु के बाजीराव को शाहू जी महाराज ने पेशवा बना दिया।

बाजीराव का पारिवारिक जीवन-

पेशवा बाजीराव ने दो शादियां की इनकी पहली पत्नी का नाम काशीबाई था और बाजीराव के चार बेटे थे।

बालाजी बाजीराव और नाना साहेब का जन्म सन् 1721 में हुआ था और बाद में बाजीराव प्रथम की मृत्यु के बाद सन् 1740 में शाहूजी ने अपना पेशवा नियुक्त किया था।

दूसरे बेटे रामचंद्र की मृत्यु जवानी में ही हो गई तीसरा बेटा रघुनाथराव 1773-74 के दौरान पेशवा के रूप में कार्यरत थे। चौथे पुत्र जनार्दन की भी जवानी में ही मृत्यु हो गई थी।

बाजीराव ने दूसरी शादी मस्तानी से की थी जो कि बुंदेलखंड के हिंदू राजा छत्रसाल और उनकी एक फारसी मुस्लिम पत्नी रूहानी बाई की बेटी थी।

बाजीराव मस्तानी से बहुत प्रेम करते थे। बाजीराव ने मस्तानी के लिए पुणे के पास एक महल भी बनवाया जिसका नाम उन्होंने ‘मस्तानी महल’ रखा।

सन 1734 में बाजीराव मस्तानी का एक पुत्र हुआ जिसका नाम कृष्णा राव रखा गया था।

जो बाद में शमशेर बहादुर प्रथम कहलाया। लेकिन पेशवा परिवार ने कभी भी इस शादी को स्वीकार नहीं किया।

बाजीराव बने सभी के लिए प्रेरणा-

हर हर महादेव के युद्ध घोष के साथ देश में केसरिया ध्वज लहरा कर ‘हिंदू स्वराज’ लाने का जो सपना वीर छत्रपति शिवाजी महाराज ने देखा था, उसको काफी हद तक मराठा साम्राज्य के चौथे पेशवा वीर बाजीराव प्रथम ने पूरा किया।

जिस वीर महायोद्धा बाजीराव पेशवा प्रथम के नाम से अंग्रेज शासक थरथर कांपते थे, मुगल शासक पेशवा बाजीराव से इतना डरते थे कि उनसे मिलने से भी घबराते थे।

हिंदुस्तान के इतिहास में बाजीराव पेशवा प्रथम अकेले ऐसे महावीर महायोद्धा थे, जिन्होंने अपने जीवन काल में 41 युद्ध लड़े और एक भी युद्ध नहीं हारे,

साथ ही वीर महाराणा प्रताप और वीर छत्रपति शिवाजी के बाद बाजीराव पेशवा का ही नाम आता है जिन्होंने बहुत लंबे समय तक अकेले ही मुगलों से लगातार बाजी जीती।

पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट एक ऐसे महान योद्धा थे निजाम मोहम्मद बंगश से लेकर मुगल अंग्रेजों पुर्तगालियों तक को युद्ध में कई बार करारी शिकस्त थी।

बाजीराव के समय में महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा ,बुंदेलखंड सहित 70 से 80 प्रतिशत भारत पर उनका शासन था। ऐसा रिकॉर्ड वीर छत्रपति शिवाजी के नाम पर भी नहीं है।

बाजीराव पेशवा जब तक जीवित रहे अजय रहे, उनको कभी कोई हरा नहीं सका। इतिहास की सुनें तो बाजीराव पेशवा घुड़सवारी करते हुए लड़ने में सबसे माहिर थे।

यह भी कहा जाता है कि उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक भारत में आज तक कभी नहीं देखा गया। घोड़े पर बैठे-बैठे बाला चलाना, बनेठी घूमाना,बंदूक चलाना उनके बाएं हाथ का खेल था।

घोड़े पर बैठे बाजीराव के भाले की फेंक इतनी अच्छी होती थी कि सामने खड़े दुश्मन को अपनी जान बचाना मुश्किल पड़ जाता था।

बाजीराव की मृत्यु-

कहा जाता है कि पेशवा बाजीराव की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 वर्ष को 39 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। उस समय वह इंदौर के पास खरगोन शहर में रुके थे।

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि बाजीराव का निधन मालवा में ही नर्मदा किनारे रावेरखेड़ी में लू लगने के कारण हुआ।

बाजीराव का केवल 40 साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया।

अगले 200 साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता।

जब भी भारत के इतिहास में महान योद्धाओं की बात होगी तो निसंदेह महान पेशवा श्रीमंत बाजीराव का नाम बड़े ही गर्व से लिया जाएगा।

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