लोकतंत्र और आंदोलन-Democracy and Movement

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लोकतंत्र सिर्फ़ एक राजनीतिक प्रविधि भर नहीं है और न सिर्फ़ एक संवैधानिक ढांचा भर है, क्योंकि कई बार संवैधानिक ढांचे में रहते हुए भी अलोकतांत्रिक निर्णय लिए गए हैं।

लोकतंत्र कानूनी प्रक्रिया से कहीं ज़्यादा एक सुव्यवस्थित लोकतांत्रिक चिंतनधारा का नाम है। यह एक प्रवृत्ति का नाम है।

यह विशिष्ट से समष्टि की ओर उन्मुखीकरण का नाम है।

यद्यपि यह बहुमत के आधार पर काम करता है पर अल्पमत को विमर्श से बाहर नहीं करता बल्कि उसके प्रति अधिकाधिक संवेदनशील रहता है।

यह बहुमत की प्रत्यंचा पर चढ़ा शरसंधान नहीं है कि अल्पमत के स्वर को मौन कर दे। लेकिन दुःखद है कि लोकतंत्र के नाम पर वह सब हो रहा है जो नहीं होना चाहिए।

इंदिरा गांधी के आपातकाल से लेकर आज तक कई बार कानूनी प्रावधानों की आड़ में जबर्दस्ती की गयी।

वर्तमान सत्ता भी सत्ता के मद में अपने घोषित एजेंडे से इतर लोकतंत्र के नाम पर विशिष्ट वर्ग के हितों को साधने के उद्योग में जुटी है और तिस पर तुर्रा यह कि कोई विरोध न करे।

इंदिरा गांधी ने तो अपनी गलती से सीख ले ली थी पर यह सीख लेने के लिए भी तैयार नहीं।

दरअसल इन्हें विरोध के बावजूद जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की अपनी एक्सक्लुसिव रणनीति की कामयाबी पर ज्यादा भरोसा है।

उन्हें लगता है कि यह वोटबैंक के स्थायीकरण की कारगर तकनीक है। परस्पर समुदायों का भय दिखाकर समुदायों को लामबंद करने की प्रविधि ज्यादा प्रभावी दिखती है, बनिस्बत विकास के मुद्दों को लेकर वोट हासिल करने के।

लोकतंत्र में जब इस तरह की प्रवृत्ति पनपने लगती है, तो लोककल्याण के मुद्दे पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। सत्ता की राजनीति केंद्र में आ जाती है और जनसरोकार के मुद्दे गौण हो जाते हैं।

लोकतंत्र की सफलता के लिए देश में लोकतंत्र का संवैधानिक ढांचा होना ही यथेष्ट नहीं है। लोकतंत्र को सफल बनाने के लिए लोकतांत्रिक मनःस्थिति का होना भी बहुत जरूरी है। लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब यह हमारी सोच में ढल जाएगा; इसे हम अपने व्यवहार का अंग बना लेंगे।

पर हमने यह भी देखा है कि किस तरह सत्ता प्रतिष्ठान लोक को अपनी रिआया समझ तानाशाही व्यवहार करने लगते हैं।

इधर लोकतंत्र के सबसे बड़े देश में एक-आध दशक से एक नई प्रवृत्ति उभर कर सामने आ रही है, वह यह है कि विरोध में उठे स्वरों को अराजकतावादी, व्यवस्थाद्रोही और समाजद्रोहीघोषित कर दो।

अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए किसी पूरी कौम को ही ब्लेम करने लगो।

अपने गलत कामों का बचाव पूर्व में हुए दूसरों के गलत कामों का हवाला देकर के आरोपों से कन्नी काट लो।

यह एक नई राजनीतिक संस्कृति का उभार है जो विपक्ष विहीन लोकतंत्र की पैरोकार है। यहां सत्ता पर प्रश्न खड़ा करते ही आप वामपंथी हो जाएंगे, टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थक हो जाएंगे। मानो वामपंथी होना देशद्रोह हो !!

 यहां प्रश्न वही स्वीकार होते हैं जो विपक्ष से पूछे जाएं। यह एक नया भारत है! यह एक अद्भुत लोकतांत्रिक शैली है!

 हालांकि विरोध के स्वरों को दबाने का चरित्र सत्ता का स्थापित चरित्र रहा है और पूर्व में भी कई सरकारों ने कई बार आंदोलनों के प्रति कठोर रवैया अपनाया।

लेकिन बावजूद इन सबके सत्ताधीषों द्वारा आंदोलनों की वांछनीयता को लेकर के कभी इतने सवाल नहीं खड़े किए गए जितने आज खड़े किए जा रहे हैं।

आंदोलन को पथभ्रष्ट साबित करने के लिए बाक़ायदा पूरी लामबंदी के साथ एक खास विचारधारा के लोग मैदान में उतर गए हैं।

वह आंदोलन को एक खास क्षेत्रीय अभिव्यक्ति बता रहे हैं। इसे अमीर किसानों का आंदोलन बताकर उनको छोटे किसानों के सामने खड़ा किया जा रहा है।

आंदोलनकर्ताओं को खालिस्तानी बताया जा रहा है। कुलमिलाकर आंदोलन के खिलाफ एक माहौल बनाया जा रहा है ताकि इसे जनविरोधी-राष्ट्रविरोधी साबित किया जा सके ।

आज से पहले आंदोलन को विफल करने हेतु आंदोलनकारी नेताओं के चरित्र हनन की ओछी कोशिशों तक कभी नहीं जाया गया।

यहां तक कि अंग्रेजों ने भी कभी अपने धुर विरोधी, धुर आंदोलनकारी गांधी का चरित्र हनन नहीं किया जबकि अपने शासन के सबसे बड़े शत्रु के खिलाफ माहौल बनाने के लिए ऐसा करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी।

और फ़िर गांधी तो उनके अपने देश के भी नहीं थे। लेकिन आज विडंबना देखिये आजाद भारत में वो लोग जो कभी राष्ट्रीय आंदोलन हिस्सा तक नहीं रहे, जिन्होंने गांधी को पढा नहीं, प्रायोजित तरीके से गाँधी-नेहरू के चरित्र-हनन में अहर्निश जुटे हैं।

जो काम अंग्रेज न कर सके वह इन होनहारों ने किया है।

आंदोलनकारियों को परजीवी/आंदोलनजीवी, अलगाववादी बताया जा रहा है। यह कौन सी लोकतांत्रिक शैली है भाई?

आप यदि विपक्ष में रहकर आंदोलन करें, तो वह लोकमत की अभिव्यक्ति का प्रतीक है। और यदि स्वयं आप सत्ता में हैं और विपक्ष आंदोलन करे तो यह विघटनकारियों की दुरभसन्धियों का प्रतिफलन!! वाह क्या अनोखा तर्क है!!!

कृषि कानूनों के खिलाफ एक क्षेत्र विशेष की मुखरता को इंगित कर यह कहा जा रहा है कि आखिर आंदोलन एक क्षेत्र-विशेष में ही क्यों तेज है? इन्हीं किसानों को क्यों दिक्कत है?

प्रकारांतर से वह यह बताना चाहते हैं कि यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन नहीं है। यह विपक्षियों की साजिश है।

क्षेत्रीयता की आड़ लेकर आप अपने कानूनों का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकते। इस तरह से देखा जाय तो स्वतंत्रता आंदोलन सबसे पहले बंगाल और महाराष्ट्र में प्रभावी हुआ तो क्या इस आधार पर उसके औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगया जा सकता।

भक्ति आंदोलन सबसे पहले दक्षिण में शुरू हुआ तो क्या यह अर्थ लगाया जाए कि उत्तरभारतीय धार्मिक नहीं थे। विवाद को संवाद से सुलझाया जाय न कि आंदोलनकारियों को लांछित कर समझौते की संभावनाओं को ही खत्म किया जाय।

आंदोलन जिन मुद्दों को लेकर हो रहा है वे गलत हैं या सही, यह विमर्श का विषय हो सकता है, पर आप असहमतियों को सुनेंगे ही नहीं यह लोकतंत्र में कैसे संभव है?

 आदरणीय अटल जी ने एक बार कहा था कि “जहाँ विरोध और विरोधियों को गद्दार मानने का भाव हो, वहाँ लोकतंत्र समाप्त होता है और तानाशाही का उदय होता है।”

अटल जी 1974 में जे.पी. के आंदोलन के प्रबल पैरोकार थे। देश में अब तक की हुई सबसे बड़ी रेल हड़ताल के नायक जॉर्ज फर्नांडिस उनके मंत्रिमंडल के महत्त्वपूर्ण चेहरों में से एक थे।

स्वयं अटल जी 1973 में केरोसिन और पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ विरोध जताने बैलगाड़ी से संसद पहुंचे थे।

आज आंदोलनकारियों को आंदोलनजीवी बताकर उपहास उड़ाया जा रहा है। क्या यह लोग अटल जी को यही पदवी देना चाहेंगे। वर्तमान सत्ताजीवी जब अपने पुरखे अटलजी की नहीं सुनते तो अपने विरोधियों की क्या सुनेंगे। 

लोकतंत्र में आंदोलन एक तरह से लोकशिक्षण की पाठशाला भी है। यह असहमतियों सामूहिक सक्रिय अभिव्यक्ति है।

पर हाँ, आंदोलन अराजकता का पर्याय न हो जाए इसके लिए आंदोलनकारियों को इसके नैतिक चरित्र को लेकर सजग रहना चाहिए। आंदोलन सजग लोकतंत्र के प्रतीक हैं।

अगर आंदोलन न होते तो हम अभी भी अंग्रेजों की दया पर जी रहे होते।

आज जिस तरह से सत्ताजीवियों द्वारा आंदोलनों को लोकतंत्र के लिए अशुभ बताया जा रहा है, वह हताशा से भरी अभिव्यक्ति है।

आंदोलन को जन्म आपकी कार्यसंस्कृति ने दिया है। मान लिया कि नए किसान-कानून, किसानों के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होंगे लेकिन फ़िर भी ऐसी क्या विवशता थी कि इन कानूनों पर किसान संगठनों की राय लेना तक जरूरी नहीं समझा गया।

मतलब उन्हीं की उन्हीं के मामलों में जरूरत नहीं महसूस की गई जिनके कल्याण के लिए कानून बनाए गए। ठीक उसी तरह जिस तरह रौलट एक्ट कमेटी जो कि भारतीय विषयों में क्रांतिकारी सुधार के लिए सुझाव देने के लिए गठित की गई थी, में एक भी भारतीय प्रतिनिधि नहीं था।

इसके अलावा जब पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, देश में लाकडाउन था, आपको ऐसी क्या अपरिहार्यता आ गयी कि इसके लिए तत्काल अध्यादेश लाना पड़ गया।

इस जल्दबाज़ी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए। कोर्ट  ने कहा कि ये कानून पर्याप्त विचार-विमर्श के ही बना दिये गए।

इसके अलावा इन कानूनों पर गठित मुख्यमंत्रियों की उच्चस्तरीय कमेटी द्वारा सम्यक विचार किये जाने के संदर्भ में केंद्रीय मंत्री और राज्यमंत्री के बयानों में विरोधाभास है।

खाद्य, रसद एवं उपभोक्ता मामलों के राज्यमंत्री दादा साहब दानवे ने संसद में बताया था कि इस कमेटी ने तीनों कानूनों में से एक “कृषि कानून आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम को अनुमोदित किया था।

हालांकि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने संशोधनों के अनुमोदन की बात का खंडन किया है। साथ ही आरटीआई एक्ट के तहत मांगी गई सूचनाओं यथा मीटिंग की मिनट्स तथा कमेटी की रिपोर्ट को देने से मना करना क्या संकेत करता है? 

क्या यह लोकतांत्रिक तरीका है?

क्या यही पारदर्शिता है? 

क्या इस तरह की कार्यशैली से भरोसा पैदा किया जा सकता है? 

कांट्रेक्ट फॉर्मिंग में विवाद की स्थिति में सिविल कोर्ट जाने के लोकतांत्रिक अधिकार को क्यों बाधित किया गया? आखिर नीयत पर शक क्यों न किया जाय? 

लोकतंत्र में आंदोलन तो होते ही रहें हैं और होते भी रहेंगे और होने भी चाहिए। यह लोकतंत्र की जीवंतता के लक्षण हैं।

लोकतंत्र में खतरा वहां हैं जहां असहमतियों को दबाया जाता है, उन्हें कुचला जाता है, उनको लांछित किया जाता है।

लोकतंत्र असहमतियों को उठाने से नहीं ख़त्म होता है बल्कि लोकतंत्र तब खत्म होता है जब मनचाही भाषा न बोलने पर पत्रकारों पर एफआईआर लॉज की जाय।

लोकतंत्र तब खतरे में पड़ता है जब विरोध को टुकड़े-टुकड़े गैंग से अभिहित किया जाता है। आखिर लोकतंत्र में सवाल क्यों न पूछे जायँ ??

क्या असहमति के स्वरों को दबाने के लिए आप इस हद तक चले जाएंगे कि आप संसद के प्रश्नकाल को स्थगित या सीमित करने के लिए सोचे या संसद के सत्र को ही ख़त्म करने की सिफारिश करें और वह भी सामान्य परिस्थितियों में। 

 जनाब यह असहमतियों का अस्वीकरण नहीं बल्कि एक प्रकार से उनका दमन है और यहीं परिस्थितियाँ आंदोलन को जन्म देती हैं। आंदोलन अलोकतांत्रिक ढंग से लिये गए राजनीतिक निर्णयों के प्रतिवाद का प्रतिफलन है। अतः आंदोलन  को लांछना न दें। संवाद से हल निकालें।

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