Explainer: एक और विक्षोभ आने को तैयार यानि फिर बारिश-बर्फबारी, कैसे समुद्र में गर्म होता पानी बना विलेन

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पहले मार्च में दो पश्चिमी विक्षोभ ने मौसम को बदल दिया. कहां ये अनुमान था कि मार्च काफी गर्म रहेगा. इसके बाद अप्रैल शुरू होते ही फिर एक और पश्चिमी विक्षोभ ने दस्तक दी. फिर बारिश और बर्फबारी ने खेती बारी और पर्यटक को सांसत में डाल दिया लेकिन बात यहीं नहीं रुक रही. बैक टू बैक एक और वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज आने के लिए तैयार है. मौसम विभाग के अनुसार ये 7 अप्रैल को दस्तक देगा. इस तरह का विक्षोभ का कहर पहली बार गर्मियों में नजर आ रहा है. क्या है इसकी वजह. क्या भूमध्य सागर का लगातार गर्म होता पानी इस खतरे की वजह है. क्यों अब विक्षोभ का संकट लगातार देखने में आ रहा है, जो मौसम के लिए खलनायक की भूमिका निभा रहा है.

मौसम विभाग के ताजा अपडेट के अनुसार, उत्तर भारत इस समय ‘बैक-टू-बैक’ यानि एक के बाद एक पश्चिमी विक्षोभों के प्रभाव में है. 3-4 अप्रैल को हुई बारिश और ओलावृष्टि के बाद अब एक और सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ दस्तक दे रहा है. पश्चिमी विक्षोभ यह एक गैर-मानसूनी वर्षा प्रणाली है जो भूमध्य सागर और अटलांटिक महासागर से उत्पन्न होती है. ये ऊंचाई वाली पश्चिमी हवाओं के साथ पूर्व की ओर बढ़ती है. जब यह भारतीय उपमहाद्वीप में हिमालय से टकराती है, तो उत्तर भारत में सर्दियों की बारिश और पहाड़ों पर बर्फबारी होती है.

नया पश्चिमी विक्षोभ कब से सक्रिय होगा?

– मौसम विभाग के अनुसार, अगला शक्तिशाली पश्चिमी विक्षोभ 7 अप्रैल से उत्तर-पश्चिमी भारत को प्रभावित करना शुरू करेगा. इसका सबसे ज्यादा असर 7 और 8 अप्रैल को देखने को मिल सकता है. इस दूसरे विक्षोभ के कारण तापमान में फिर से 2 से 4 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आ सकती है, जिससे अप्रैल की शुरुआत में होने वाली भीषण गर्मी से फिलहाल राहत बनी रहेगी

किन इलाकों पर होगा असर?

– जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचे इलाकों में भारी बर्फबारी और मध्यम बारिश की संभावना है. साथ ही मैदानी इलाकों में दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गरज-चमक के साथ बारिश और तेज हवाएं चलने का अनुमान है.

मौसम के लिए कैसे ये बार बार का पश्चिमी विक्षोभ खतरा बन रहा है

– खेती पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इस समय गेहूं की कटाई का सीजन है. 7 अप्रैल से आने वाला यह सिस्टम किसानों के लिए चिंताजनक हो सकता है. ओलावृष्टि की चेतावनी भी जारी की गई है, जो तैयार फसल को नुकसान पहुंचा सकती है.

बार – बार मजबूत पश्चिमी विक्षोभ के बनने की वजह क्या है

भारत के लिए इसकी सबसे बड़ी वजह है भूमध्य सागर में समुद्र के पानी का लगातार बढ़ता तापमान. जो एक के बाद एक पश्चिमी विक्षोभ बना रहा है. दरअसल भूमध्य सागर और कैस्पियन सागर के तापमान में वृद्धि होने से हवा में नमी धारण करने की क्षमता बढ़ गई है. गर्म समुद्र अधिक वाष्पीकरण पैदा करते हैं, जिससे हवा में बड़े पैमाने पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जो तूफान बनकर पूर्व की ओर चल पड़ता है. पहले ये विक्षोभ हल्की क्षमता के बनते थे लेकिन अब ये ज्यादा ताकतवर और मजबूत होते जा रहे हैं. यही कारण है कि अब पश्चिमी विक्षोभ पहले की तुलना में अधिक उग्र और अनिश्चित हो गए हैं।

क्या इसका असर केवल भारत पर ही हो रहा है?

नहीं पश्चिमी विक्षोभ एक वैश्विक घटना है, लेकिन भौगोलिक स्थिति के कारण इसका प्रभाव क्षेत्रों के अनुसार अलग होता है. भूमध्य सागर के पानी के गर्म होने से इसका असर पश्चिमी विक्षोभ के तौर पर इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के साथ भारत में हो रहा है. इसी की वजह से इन देशों में भारी बारिश और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं.
भारत इसका ‘अंतिम पड़ाव’ है. हिमालय एक दीवार की तरह काम करता है, जिससे पूरी नमी उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में गिर जाती है. इसलिए भारत पर इसका प्रभाव सबसे सघन और दीर्घकालिक होता है.

खेती-किसानी और मौसम पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?

पश्चिमी विक्षोभ का बदलता पैटर्न भारतीय कृषि के लिए बहुत खराब साबित हो रहा है. गेहूं, सरसों और चने की फसल को दिसंबर-जनवरी की हल्की बारिश की जरूरत होती है. उस समय ये ज्यादा हुई नहीं लेकिन अब देरी से आ रहे ये विक्षोभ ओलावृष्टि, बारिश कर रहे हैं, इससे खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है.

आंकड़े क्या कहते हैं. पांच साल पहले कितने विक्षोभ आते थे और अब उनकी क्या हालत है

विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिमी विक्षोभों की संख्या से ज्यादा उनकी तीव्रता और समय में बदलाव आया है. 5-6 साल पहले भी सालभर में औसतन 60-70 विक्षोभ आते थे, अब भी उतने ही हैं. अंतर बस इतना है कि अब मजबूत विक्षोभ की फ्रीक्वेंसी बढ़ी है. पहले विक्षोभ का प्रभाव दिसंबर और जनवरी में अधिक दिखता था. अब ये फरवरी, मार्च और अप्रैल में अधिक सक्रिय हो रहा है. जब विक्षोभ जाड़े के समय आते थे तो हल्की और स्थिर बारिश होती थी लेकिन उसके इस बदले रुख ने एक्सट्रीम वेदर यानि कम समय में काफी ज्यादा बारिश और भीषण ओलावृष्टि के हालात पैदा कर दिए हैं.

खतरा क्यों बड़ा है?

पहले पश्चिमी विक्षोभ केवल सर्दियों के दोस्त माने जाते थे, लेकिन अब समुद्र के गर्म होने के कारण ये “बेमौसम के दुश्मन” बनते जा रहे हैं. जब अरब सागर की नमी इन विक्षोभों से मिलती है, तो यह हिमालयी क्षेत्रों में वैसी ही तबाही मचाती है जैसी हमने पिछले कुछ वर्षों में केदारनाथ या हिमाचल की बाढ़ के रूप में देखी है.

क्या ये असर जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का है

– बिल्कुल हम जो एक के बाद एख पश्चिमी विक्षोभ और उनके व्यवहार में बदलाव देख रहे हैं, वह ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन का ही सीधा असर है. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण उत्तर ध्रुव तेजी से गर्म हो रहा है. इससे जेट स्ट्रीम का मार्ग लहरदार हो गया है. पहले ये हवाएं एक सीधी पट्टी में चलती थीं, लेकिन अब ये डगमगा रही हैं. इसी वजह से पश्चिमी विक्षोभ कभी बहुत लंबे समय तक एक ही जगह रुक जाते हैं, तो कभी एक के बाद एक आने लगते हैं.
पश्चिमी विक्षोभ अपनी नमी मुख्य रूप से भूमध्य सागर से लेते हैं. समुद्र का पानी गर्म होने से वाष्पीकरण बढ़ गया है. इससे समुद्र तल के आसपास गर्म हवा ज्यादा बन रही है. गर्म हवा में नमी सोखने की क्षमता ज्यादा होती है. ये गर्म हवाएं ऊपर उठती हैं. वबंडर बनाती हैं. जेट स्ट्रीम के साथ मिलती हैं और भारत की ओर मुड़ जाती हैं. अब ये पहले की तुलना में कहीं अधिक ‘भारी’ और ‘उग्र’ होने लगी हैं, जिससे अचानक भारी बारिश या बड़े ओले गिरते हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण अब सर्दियां देरी से शुरू होती हैं और जल्दी खत्म हो रही हैं. वायुमंडल का पूरा चक्र शिफ्ट होता लग रहा है. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अरब सागर भी बहुत गर्म हो गया है.
जब भूमध्य सागर से आया पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत पहुंचता है, तो उसे अरब सागर से भी अतिरिक्त नमी उसमें मिल जाती है. यह दोहरी नमी मिलकर भीषण ‘थंडरस्टॉर्म’ बनाती है, जैसा हम अभी देख रहे हैं.



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