Explainer: क्या भारत में अब LPG में भी मिक्स की जाएगी एथेनॉल या DME, क्या होती है ये

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ईरान युद्ध शुरू होने के साथ ही जैसे उसका असर खाड़ी देशों और होमुर्ज समुद्री रास्ते पर पड़ना शुरू हुआ, भारत में एलपीजी की किल्लत होने लगी. भारत सरकार ने भी माना कि एलपीजी आपूर्ति पर असर पड़ा है. हो सकता है कि इसका असर आने वाले समय में और पड़े. इसके साथ ही ये चर्चा भी चल पड़ी है कि जिस तरह सरकार ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल को ब्लैंड कर दिया है, क्या वैसा एलपीजी के साथ भी हो सकता है.

तो हम आपको बता दें कि ये कोशिश LPG यानि रसोई गैस के क्षेत्र में भी पूरी दुनिया और भारत में शुरू हो चुका है. आने वाले समय में हो सकता है कि आपको जो एलपीजी मिले, वो मिक्स हो. LPG में एथेनॉल की तरह जो चीज़ मिलाई जाती है, उसे तकनीकी भाषा में DME यानि डाइमिथाइल ईथर कहते हैं.

पेट्रोल-एथेनॉल की तरह एलपीजी में डीएमई यानि डाइमिथाइल ईथर को मिक्स किया जा सकता है। इसके गुण एलपीजी में होने वाले प्रोपेन और ब्यूटेन से काफी मिलते-जुलते हैं.

डीएमई क्या है

ये एक स्वच्छ जलने वाला ईंधन है जिसे कोयले, कृषि अवशेषों या नगरपालिका के कचरे से बनाया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी में 20% तक DME बिना किसी बड़े बदलाव के मिलाया जा सकता है. इससे न तो सिलेंडर बदलने की जरूरत होगी और न ही चूल्हा.

भारत में इसकी मौजूदा स्थिति

भारत अपनी जरूरत का लगभग 60-65% एलपीजी आयात करता है. पश्चिम एशिया संकट की वजह से एलपीजी की सप्लाई और कीमतों पर काफी असर पड़ा है. इसके समाधान के लिए भारत सरकार और वैज्ञानिक सक्रिय हैं. पुणे के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (Council of Scientific & Industrial Research) – एलसीएल ने एक स्वदेशी तकनीक विकसित की है जिससे मेथनॉल को DME में बदला जा सकता है.

BIS यानि भारतीय मानक ब्यूरो ने LPG के साथ 20% DME मिश्रण के मानकों को पहले ही हरी झंडी दिखा दी है. बिट्स पिलानी के वैज्ञानिकों ने हाल ही में पावर प्लांट से निकलने वाली कॉर्बन डाई ऑक्साइड को यानि CO₂ को सीधे DME में बदलने की तकनीक पर भी सफलता पाई है.

क्या दूसरे देशों में ऐसा हो रहा है

हां, दुनिया के कई देशों में यह काम काफी पहले शुरू हो चुका है.
चीन – यह दुनिया में डीएमई का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. वहां बड़े पैमाने पर एलपीजी में इसे मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है.
इंडोनेशिया – यहां सरकार ने अपनी आयात निर्भरता कम करने के लिए कोयले से डीएमई बनाने और उसे एलपीजी में मिक्स करने की एक बड़ी योजना शुरू की है.

चीन के पास डीएमई की स्थापित उत्पादन क्षमता लगभग 2 करोड़ मीट्रिक टन है, जो दुनिया में सबसे अधिक है (AI News18 Image)

यूरोप और अमेरिका- स्वीडन और कैलिफोर्निया जैसे क्षेत्रों में बॉयो डीएमई और बॉयो एलपीजी पर काम हो रहा है, जो कचरे और नवीकरणीय स्रोतों से बनाया जाता है.

चीन इसमें कैसे आगे निकल गया

चीन वास्तव में डाइमिथाइल ईथर यानि डीएमई का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है. चीन के पास डीएमई की स्थापित उत्पादन क्षमता लगभग 2 करोड़ मीट्रिक टन है, जो दुनिया में सबसे अधिक है. चीन में डीएमई का सबसे बड़ा उपयोग एलपीजी के साथ मिश्रण करके घरेलू खाना पकाने और हीटिंग के लिए किया जाता है.
वैश्विक डीएमई बाजार में तेजी से वृद्धि होने की उम्मीद है. यह बाजार 2026 में लगभग 12 अरब डॉलर से बढ़कर 2034 तक 24 अरब डॉलर से अधिक होने का अनुमान है.

क्या सीधे एथेनॉल भी इस्तेमाल हो सकता है

एथेनॉल एक तरल है और LPG एक गैस. इसलिए इन्हें आपस में मिलाना थोड़ा कठिन है लेकिन भारत में एथेनॉल आधारित कुकिंग स्टोव को बढ़ावा देने की चर्चा शुरू हो गई है. हाल ही में मार्च 2026 की रिपोर्टों के अनुसार, अनाज से एथेनॉल बनाने वाली कंपनियां सरकार से मांग कर रही हैं कि जिस तरह पेट्रोल में ब्लेंडिंग हुई, वैसे ही एथेनॉल स्टोव को एक विकल्प के रूप में लाया जाए.

इससे क्या गैस चूल्हे की क्षमता पर असर पड़ेगा

वैज्ञानिकों ने इस पर कई शोध किए हैं. सामान्य एलपीजी की तुलना में डीएमई की कैलोरिफिक वैल्यू यानि ऊर्जा क्षमता थोड़ी कम होती है. सरल शब्दों में कहगें तो 1 किलो LPG जितनी गर्मी देती है उसकी तुलना में 1 किलो डीएमई 30% कम गर्मी पैदा करता है. यानि अगर LPG में 20% तक DME मिलाते हैं, तो चूल्हे की थर्मल एफिशिएंसी में कोई खास गिरावट महसूस नहीं होगी. खाना पकने के समय में मामूली यानि 2 से 4% का अंतर आ सकता है.

अगर एलपीजी में डीएमई मिक्स किया गया तो चूल्हे की थर्मल एफिशिएंसी में कोई खास गिरावट महसूस नहीं होगी. (AI News18 Image)

चूंकि डीएमई के गुण एलपीजी के काफी करीब हैं, इसलिए:नीली लौ के रंग में कोई बदलाव नहीं दिखेगा. यह वैसी ही नीली और साफ़ रहेगी. चूल्हे के बर्नर या नॉब में बदलाव की भी जरूरत नहीं होगी. मौजूदा चूल्हे इस मिश्रण को आसानी से झेल सकते हैं.

डीएमई में सल्फर और नाइट्रोजन के अंश बहुत कम होते हैं, जिससे चूल्हा और बर्तन कम काले पड़ते हैं. हवा साफ़ रहती है. हालांकि रेगुलेटर की रबर सील और गैस पाइप को ये धीरे धीरे जरूर नुकसान पहुंचा सकती है. सरकार और कंपनियां अब डीएमई कंपेटबल रबर और सील वाले रेगुलेटर और पाइप विकसित कर रही हैं.

क्या ये मौजूदा एलपीजी से ज्यादा सस्ती पडे़गी

इसका जवाब ये है कि हां, लंबी अवधि में इसके सस्ता होने की पूरी संभावना है. उत्पादन लागत कम होगी. इस पर सब्सिडी का बोझ भी कम होगा. इससे कम कीमत पर सिलेंडर मिलने के अवसर तो बढ़ते हैं.

ये कितनी सुरक्षित

सुरक्षा और लीकेज के लिहाज से डीएमई और एलपीजी का मिश्रण काफी सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसमें कुछ तकनीकी बारीकियां हैं. LPG में अपनी कोई गंध नहीं होती, इसलिए उसमें ‘मरकैप्टन’ मिलाया जाता है ताकि लीकेज का पता चल सके. डीएमई के साथ भी यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी, जिससे अगर गैस लीक होती है, तो आपको तुरंत पता चल जाएगा.

DME की ज्वलनशीलता LPG जैसी ही है. मतलब ये LPG से ज्यादा खतरनाक नहीं है, बल्कि यह अधिक साफ़ जलती है जिससे जहरीली गैसें जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड कम पैदा होती हैं.

मेथनॉल इकोनॉमी मिशन, जिसमें कोयले से बनेगी डीएमई

भारत का मेथनॉल इकोनॉमी मिशन नीति आयोग की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्य भारत की विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता को कम करना और स्वदेशी संसाधनों का उपयोग करना है.

मिशन के केंद्र में कोयला है, क्योंकि भारत के पास दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा कोयला भंडार है. भारत में मिलने वाला कोयला ‘हाई-एश’ श्रेणी का है, जिसे बिजली बनाने के लिए जलाना प्रदूषण फैलाता है लेकिन इस मिशन के तहत इसे गैसीफिकेशन तकनीक से उपयोग किया जाएगा. इसमें पहले कोयले को गैस में बदला जाता है. उस गैस से मेथनॉल बनाया जाता है. आखिर में मेथनॉल से पानी का एक अणु हटाकर उसे डीएमई में बदल दिया जाता है.

इस मिशन के कई बड़े फायदे बताए गए हैं. एलपीजी में 20% DME मिलाने से भारत सालाना लगभग 6,000 से 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचा सकता है. चूंकि ये सस्ता होगा लिहाजा प्रति सिलेंडर उपभोक्ताओं को 50 से 100 रुपये तक की बचत हो सकती है. कोयले को सीधे जलाने के बजाय उसे डीएमई में बदलकर जलाने से कार्बन उत्सर्जन में 20% तक की कमी आती है.

अब पुणे स्थित CSIR-NCL ने मेथनॉल से डीएमई बनाने की स्वदेशी कैटलिस्ट तकनीक विकसित होने के बाद हैदराबाद और त्रिची में ऐसे प्लांट पर काम चल रहा है जो रोज़ाना कोयले से मेथनॉल तैयार कर सकें.



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