Explainer: भवानीपुर में BJP का खेल, चक्रव्यूह में उलझीं ममता बनर्जी, सुवेंदु अधिकारी नहीं ये डेटा हैं सिरदर्द?

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मधुपरना दास

Mamata Banerjee Toughest Test in Bhabanipur: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भवानीपुर सीट ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे कठिन परीक्षा साबित हो रहा है. यह लड़ाई सिर्फ भाजपा उम्मीदवार और विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ नहीं है, बल्कि वोटर लिस्ट के बड़े बदलाव, डेमोग्राफिक शिफ्ट और वोटर डिलीशन के आंकड़ों के खिलाफ है. भवानीपुर हमेशा से ममता बनर्जी का गढ़ रहा है. लेकिन यह सीट अब राजनीतिक और प्रशासनिक चक्रव्यूह में फंसता दिख रहा है. भवानीपुर कोलकाता दक्षिण का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है. यहां बंगाली भद्रलोक वोट के साथ-साथ ठीक-ठाक संख्या में गैर-बंगाली व्यापारी समुदाय, गुजराती, पंजाबी और हिंदी भाषी रहते हैं.

वर्ष 2011 से ममता यहां से लगातार जीतती आई हैं. 2021 के उपचुनाव में उन्होंने भाजपा की प्रियंका तिबरेवाल को रिकॉर्ड 58,832 वोटों के अंतर से हराया था. उस समय टर्नआउट करीब 57 फीसदी था और ममता को 85,263 वोट मिले थे. लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में स्थिति बदल गई. भवानीपुर असेंबली सेगमेंट में टीएमसी की लीड महज 8,297 वोटों की रह गई. भाजपा ने यहां के आठ में से पांच वार्डों में लीड हासिल की.

डेमोग्राफिक चेंज और एंटी-टीएमसी वोट

भवानीपुर में पहले करीब दो लाख वोटर थे. औसतन 60 फीसदी टर्नआउट पर करीब 1.20 लाख वोट पड़ते हैं. पिछले चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक 45-50 फीसदी वोटर पारंपरिक रूप से टीएमसी के खिलाफ जाते रहे हैं. भाजपा अब इन गैर-बंगाली वोटर्स (लगभग 46 फीसदी) को टारगेट कर रही है. ये वोटर्स टीएमसी की ‘ओनली बंगाली’ छवि से खुद को दूर महसूस करते हैं.

युवा और मोबाइल वोटर्स की बढ़ती संख्या ने भी पुराने वोट ब्लॉक्स को तोड़ा है. भाजपा का दांव गणित पर आधारित है. अगर ये वोटर्स एकजुट हो जाएं और इनके एकतरफा वोट टीएमसी मिले तो भवानीपुर में मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है. शुवेंदु अधिकारी 2021 में नंदीग्राम में ममता को हरा चुके हैं. वह अब भवानीपुर से भाजपा उम्मीदवार हैं. यह प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तर पर दबाव है.

एसआईआर का सबसे बड़ा असर

इस सीट पर 47,000 वोटर डिलीट हुए हैं. लेकिन, असली सिरदर्द वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) है. भवानीपुर में SIR प्रक्रिया शुरू होने पर 2,06,295 वोटर थे. फाइनल लिस्ट में करीब 47,000 नाम डिलीट हो गए. इसके अलावा 14,000 से ज्यादा वोटर्स ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में हैं, जिनकी किस्मत दस्तावेज सत्यापन पर निर्भर है. यह संख्या 2021 के ममता की जीत के मार्जिन (58,000+) से सिर्फ 11,000 कम है. अगर इनमें से ज्यादातर टीएमसी समर्थक वोटर्स थे, तो पार्टी की स्थिति कमजोर हो सकती है. टीएमसी ने इसे टारगेटेड कार्रवाई बताया है. ममता बनर्जी ने भी नाम कटने वाले वोटर्स से अपील करने की अपील की और इसे भाजपा की साजिश करार दिया. दूसरी ओर, भाजपा इसे क्लीन वोटर लिस्ट का अभियान बता रही है. पार्टी की राज्य महासचिव लॉकेट चटर्जी ने कहा कि केवल असली वोटर ही बंगाल का भविष्य तय करेंगे. भाजपा का मानना है कि SIR ने फर्जी वोटर्स को हटाकर असली गणित सामने लाया है.

ममता के लिए डबल चैलेंज

ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव अब सिर्फ शुवेंदु अधिकारी को हराने का नहीं रह गया है. उनका कैंपेन फीरहाद हाकिम संभाल रहे हैं. मैसेजिंग तेज है, आउटरीच ज्यादा डायरेक्ट है. लेकिन डेमोग्राफिक शिफ्ट और वोटर लिस्ट का बदलाव दोनों ही उनके लिए चुनौती हैं. मुस्लिम बहुल वार्ड 77 और 82 में टीएमसी अभी मजबूत है, लेकिन भवानीपुर के मध्य में झुकाव भाजपा की ओर दिख रहा है. शुवेंदु अधिकारी ने पहले ही दावा किया है कि एसआईआर के बाद वे भवानीपुर में ममता को 20,000 वोटों से हरा देंगे. अमित शाह की मौजूदगी में नामांकन दाखिल करते समय भाजपा ने भवानीपुर में रोडशो किया, जो टीएमसी के गढ़ में सीधा संदेश था.

आगे क्या?

भवानीपुर अब सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की राजनीति का टेस्ट केस बन गया है. अगर भाजपा यहां अच्छा प्रदर्शन करती है, तो यह टीएमसी की अजेय छवि को बड़ा झटका देगा. वहीं, अगर ममता बड़े मार्जिन से जीतती हैं तो वे साबित करेंगी कि उनका जनाधार अभी भी मजबूत है. वोटर लिस्ट में डिलीशन और एडजुडिकेशन का असर अंतिम मतदान प्रतिशत और वोट शेयर पर पड़ेगा. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि डेमोग्राफिक बैलेंस जहां हमेशा महत्वपूर्ण रहा है, वहां वोटर में कोई भी चेंज राजनीतिक नतीजों को बदल सकता है.



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