किसी भी एयरपोर्ट की जान होती है उसकी हवाई पट्टी. बगैर इसके तो किसी एयरपोर्ट की कल्पना ही नहीं की जा सकती. हाल ही में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट शुरू हो गया. इसे बनने में करीब चार साल लगे. इस एयरपोर्ट में अभी एक रनवे यानि एक हवाई पट्टी बनाई गई है. फ्यूचर में इसे 5 तक ले जाने की योजना है. वैसे आपने कभी सोचा है कि एक रनवे यानि हवाई पट्टी बनती कैसे है. इसकी परत जमीन के नीचे कितनी मोटी होती है और जमीन के ऊपर कितनी. कितना गड्ढा इसके लिए खोदा जाता है. एक आदर्श या बेस्ट पट्टी कब मानी जाती है.
वैसे आपको रनवे के बारे में सबकुछ बताने से पहले इतना बताते चलते हैं कि भारत में अभी सबसे ज़्यादा रनवे यानि एयर स्ट्रिप वाला एयरपोर्ट दिल्ली का इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है. यहां अभी 4 रनवे से फ्लाइट उड़ती और उतरती हैं. इसके अलावा केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, बेंगलुरु में 2 समानांतर रनवे हैं.
दुनिया में सबसे ज़्यादा एयर स्ट्रिप वाला एयरपोर्ट आमतौर पर अमेरिका का हार्ट्सफील्ड जैक्सन अटलांटा इंटरनेशनल एयरपोर्ट है. जहां 5 समानांतर रनवे हैं. अब आइए आपको रनवे बनने से लेकर इसकी सारी प्रक्रियाओं के बारे में बताते हैं. वैसे एक अच्छा रनवे इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है, क्योंकि इस पर बहुत भारी प्लेन काफी ज्यादा स्पीड से उतरते हैं. ऐसे में इस एयरस्ट्रिप को ऐसा बनाया जाता है कि हर लिहाज से परफेक्ट हो.
हवाई पट्टी कैसे बनती है
हवाई पट्टी कोई साधारण सड़क नहीं है. ये कई सौ टन विमानों के भारी वजन, तेज स्पीड और बार-बार लैंडिंग-टेकऑफ को झेलने के लिए बनाई जाती है. जमीन के अंदर से लेकर ऊपर तक पूरी पट्टी 2.5 मीटर से लेकर तीन मीटर या इससे ज्यादा मोटी होती है. इसमें कई परतें होती हैं. हर परत का अपना काम है – नीचे की परतें मजबूती देती हैं तो ऊपरी परत फ्रिक्शन और स्मूथनेस देती है.
हवाई पट्टी के लिए खुदाई कितनी गहरी होती है?
खुदाई की गहराई निश्चित नहीं होती – यह मिट्टी की मजबूती, पानी का स्तर और मौसम पर निर्भर करती है. आमतौर पर 3 से 10 फीट (1-3 मीटर) तक खुदाई या भराई की जाती है ताकि नीचे की मूल मिट्टी तैयार हो सके. अगर मिट्टी कमजोर है तो खराब मिट्टी निकालकर नई भराई की जाती है. उसे दबाकर कॉम्पैक्ट किया जाता है. सभी परतें मिलाकर एयरस्ट्रिप 2.5 मीटर से ज्यादा मोटी बनाई जाती है.
हवाई पट्टी में क्या-क्या डालते हैं?
रनवे की संरचना केक की तरह होती है. नीचे की मिट्टी की परत सबसे मोटी होती है 1-2 मीटर या उससे ज्यादा. इसमें मूल मिट्टी का इस्तेमाल होता है. इसे बहुत अच्छी तरह दबाया जाता है ताकि परफेक्ट कांपैक्ट फाउंडेशन तैयार हो सके. इसके बाद 30 – 60 सेमी का लेयर कंकड़, बालू, ग्रेनाइट एग्रीगेट का होता है. जिससे पानी की निकासी भी होती रहे. इसके ऊपर मजबूत बेस कोर्स के लिए 20-40 सेमी के क्रश्ड स्टोन और सीमेंट ट्रीटेड बेस मिलाकर बिछाते हैं ताकि भारी लोड बर्दाश्त कर सके.
इसके ऊपर सबसे ऊपरी सतह होती है, जो 15 – 45 सेमी की होती है, सीमेंट कंक्रीट युक्त होती है. ताकि विमान को ग्रिप दे सके. आमतौर पर रनवे के ऊपर की सतह दो तरह की होती है एक विशुद्ध कंक्रीट तकनीक से बनती है और दूसरी एस्फाल्ट तकनीक की होती है, जो सस्ती और आसानी रिपेयर की जा सकने वाली होती है. भारत में ज्यादातर बड़े एयरपोर्ट्स पर कंक्रीट या मिश्रित दोनों का इस्तेमाल होता है. एस्फाल्ट ट्रैक को हॉट मिक्स ट्रक और रोलर से बिछाया जाता है.
रनवे बनाने की पूरी प्रक्रिया क्या होती है.
रनवे बनाने से पहली इसकी पूरी प्रापर प्लानिंग की जाती है, उसमें ये देखा जाता है कि वहां हवा कैसी चलती है. मौसम कैसा रहता है. किस तरह के हवाई जहाज इस एयरस्ट्रिप पर उतरेंगे. इसी के आधार पर उन्हें डिजाइन करते हैं और लंबाई -चौड़ाई तय करते हैं. पट्टी बनने से पहले उसका डिजाइन तैयार हो जाता है. जमीन समतल की जाती है खुदाई, भराई और ग्रेडिंग होती है. मिट्टी को लेयर बाय लेयर दबाकर 95-98 फीसदी सघनता तक लाया जाता है. ड्रेनेज पाइप्स लगाया जाता है ताकि पानी न रुके.
रनवे के साथ क्या लाइट्स भी लगी होती हैं
– हां, रनवे इस तरह बनाए जाते हैं कि उसमें लाइट्स भी लगाई जा सकें. उसमें मार्केिंग सफेद पीली लाइनों से होती है. टचडाउन जोन होते हैं, लाइट्स का पूरा सिस्टम काम करता है. किसी भी एयरस्ट्रिप को हरी झंडी देने से पहले उसका लोड टेस्ट, फ्रिक्शन टेस्ट और फ्लाइट चेक होता है.
बेस्ट स्ट्रिप कब और कैसे बनती है?
बेस्ट रनवे तब बनती है जब मौसम सूखा और गर्म हो. तापमान 10°C से ऊपर हो. बारिश न हो. ऐसे में कंक्रीट अच्छे से सूखता है, एस्फाल्ट ठीक से बंधता है. भारत में इसके लिए बेहतर समय मानसून के बाद अक्टूबर से मार्च तक का होता है. हर परत को 95% से ज्यादा कॉम्पैक्ट रखा जाता है. अच्छी क्वालिटी की सामग्री इस्तेमाल होती है. इसका सख्त क्वालिटी कंट्रोल भी होता है. ड्रेनेज परफेक्ट हो ताकि पानी न रुके. अगर इसे बारिश या सर्दी में बनाया जाए तो परतें कमजोर पड़ सकती हैं – इसलिए बड़े एयरपोर्ट्स प्रोजेक्ट को ड्राई सीजन में शेड्यूल करते हैं.
क्यों हवाई पट्टी बनाने को इंजीनियरिंग चमत्कार कहा जाता है
– वाकई एक हवाई पट्टी बनाने को इंजीनियरिंग का चमत्कार ही कहा जाता है, क्योंकि इसमें नीचे की मिट्टी से शुरू होकर 2.5 मीटर या इससे मोटी कई लेयर की “केक” बनाई जाती है, जिसमें हर परत विमान के लाखों किलो वजन को बर्दाश्त करती है. ये सही खुदाई, सही सामग्री और सही मौसम के परफेक्ट कांबीनेशन से ही हो पाता है. इसे हर मौसम को झेलने वाला सुपर स्ट्रक्चर भी कहा जाता है.
रनवे की लंबाई और चौड़ाई क्या होती है
बड़े अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट्सकी रनवे 3,700 से 4,430 मीटर यानि पौने चार किमी से साढ़े चार किमी लंबी होती हैं दिल्ली एयरपोर्ट की एक रनवे 4,430 मीटर लंबी और 60 मीटर चौड़ी है.
A380 जैसे सबसे बड़े विमान के लिए एयरस्ट्रिप की चौड़ाई 60 मीटर जरूरी. अगर पट्टी पतली हो तो विशाल विमान का बैलेंस बिगड़ सकता है. रनवे की लंबाई समुद्र तल से ऊंचाई, तापमान, हवा की गति और विमान के वजन पर निर्भर करती है. गर्म हवा या ऊंचाई पर हवा पतली हो जाती है, इसलिए रनवे लंबी करनी पड़ती है.
अगर एक सामान्य सड़क से रनवे की तुलना करें तो
एक सामान्य सड़क सिर्फ़ 20-30 cm मोटी होती है, लेकिन रनवे की मोटाई ढाई से तीन मीटर तक होती है, ये सड़क की तुलना में 10 गुना ज्यादा मजबूत होती है. ये रनवे 500 टन से ज्यादा वजन के प्लेन को संभालने की क्षमता रखते हैं. एयरस्ट्रिप की वजन संभालने की क्षमता को “एलीफैंट हर्ड” कहा जाता है.एय़रबस A380 दुनिया का सबसे बड़ा पैसेंजर विमान है. इसका टेकऑफ वेट लगभग 560-575 टन होता है. लैंडिंग पर यह पूरा वजन रनवे पर आता है. A380 में 22 व्हील होते हैं, फिर भी हर व्हील पर बहुत भारी प्रेशर पड़ता है. रनवे इसे बिना टूटे झेल लेती है. यानि एक जगह पर 100 से 115 हाथियों का कुल वजन पड़ता है.
एयरस्ट्रिप के और हैरान करने वाले पैरामीटर्स क्या होते हैं
इनकी ढलान बहुत कम होती है. लंबाई में 0.3-1% से ज्यादा नहीं. अगर ज्यादा ढलान हो तो विमान रुक नहीं पाएगा या टेकऑफ में दिक्कत होगी. ड्रेनेज इतना बेहतर हो कि पानी एक मिनट में निकल जाए. खराब ड्रेनेज से रनवे कमजोर हो जाता है.
कोई भी रनवे दरअसल भौतिकी, मैटेरियल साइंस और प्रिसीजन इंजीनियरिंग का कमाल है. एक छोटी सी गलती से पूरा विमान खतरे में पड़ सकता है, इसलिए हर चीज़ इंटरनेशनल एविशन एजेंसियों और भारत के डायरेक्टेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन के स्टैंडर्ड के मुताबिक परफेक्ट होती है.
एक एयरस्ट्रिप बनने में कितना समय लगता है और ये कितना चलती है
छोटे एयरपोर्ट या साधारण रनवे में 1 से 2 साल लगता है तो बड़े अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट की नई रनवे बनने में 3 से 8 साल या इससे ज्यादा भी लग जाते हैं.




