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ईरान के साथ जारी संघर्ष ने अमेरिका के F-16, F-35 और F-18 जैसे घातक विमानों के ‘अजेय’ होने के दावे को ध्वस्त कर दिया है. सालों तक भारत पर इन विमानों को खरीदने का दबाव बनाने वाला अमेरिका आज युद्ध क्षेत्र में अपने ही सबसे आधुनिक हथियारों को बचाने में नाकाम साबित हो रहा है. राफेल के खिलाफ दुष्प्रचार करने वाली अमेरिकी लॉबी के लिए यह करारा जवाब है कि युद्ध विज्ञापनों से नहीं बल्कि ठोस तकनीक और परिणाम से जीते जाते हैं.
अमेरिका का प्रोपेगेंडा फेल हो गया है. (AI Image)
नई दिल्ली. पश्चिम एशिया के रणक्षेत्र से आ रही खबरें वैश्विक रक्षा बाजार और सैन्य कूटनीति में हलचल मचा रही हैं. दशकों तक जिस अमेरिकी हवाई ताकत का लोहा पूरी दुनिया मानती थी आज ईरान और उसके सहयोगियों के सामने उसकी चमक फीकी पड़ती दिख रही है. बुधवार को खबर आई कि रणक्षेत्र में ईरान ने अब अमेरिका के एफ-16 विमान को भी गिरा दिया है. इससे पहले F-18 और दुनिया का सबसे महंगा स्टील्थ फाइटर F-35 जिन्हें अमेरिका आसमान का अजेय योद्धा कहता था, वो युद्ध के मैदान में गिराए गए. राफेल के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने वाले अमेरिका की हालत इस युद्ध में पतली है. इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि राफेल के साथ जाने का भारत सरकार का फैसला पूरी तरह सही था.
खुल गई अमेरिकी मार्केटिंग की पोल
अमेरिका ने हमेशा अपने हथियारों को तकनीक से ज्यादा ब्रांड के रूप में बेचा है. भारत के सामने सालों तक F-16 (विपुल वेरिएंट) और F-18 सुपर हॉर्नेट की जमकर मार्केटिंग की गई. अमेरिकी प्रशासन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया कि भारत इन विमानों को खरीदे लेकिन भारत की दूरदर्शी रणनीतिक सोच ने इसे ठुकरा दिया. आज युद्ध के मैदान में इन विमानों की जो हालात हैं वे बताते हैं कि भारत का फैसला सही था.
अमेरिका के ये सुपर फाइटर्स अब उन चुनौतियों को नहीं झेल पा रहे हैं जिनके लिए उन्हें बनाया गया था. ईरान ने अपनी स्वदेशी ड्रोन तकनीक और सटीक मिसाइल हमलों से यह साबित कर दिया है कि महंगे विमानों का मतलब हमेशा जीत नहीं होता. जब अमेरिका के आधुनिकतम हथियार ही अपनी सुरक्षा नहीं कर पा रहे तो वह दूसरे देशों को सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकता है?
अमेरिका की पतली होती हालत
इस युद्ध ने अमेरिका की सैन्य साख को गहरा धक्का पहुंचाया है. एक समय था जब अमेरिकी जेट्स के नाम से दुश्मन थर्राते थे लेकिन आज ईरान की लो-कॉस्ट वॉरफेयर तकनीक ने इन करोड़ों डॉलर के विमानों की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अमेरिका की हालत इस युद्ध में इसलिए भी पतली है क्योंकि वह न केवल तकनीकी रूप से पिछड़ता दिख रहा है बल्कि उसकी आर्थिक कमर भी टूट रही है. एक ओर ईरान के सस्ते ड्रोन और मिसाइलें हैं और दूसरी ओर उन्हें रोकने के लिए अमेरिका के लाखों-करोड़ों के इंटरसेप्टर और महंगे फाइटर जेट्स जो अब असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
राफेल के खिलाफ झूठा प्रचार
जब भारत ने फ्रांस से राफेल खरीदने का फैसला किया तब अमेरिकी लॉबी और तत्कालीन ट्रंप प्रशासन ने इसके खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया था. राफेल की क्षमताओं को कमतर दिखाने और उसके गिरने या असफल होने को लेकर कई तरह के भ्रम फैलाए गए. ट्रंप और उनकी टीम ने भारत को डराने और दबाव में लेने की कोशिश की ताकि भारत रूसी या फ्रांसीसी तकनीक के बजाय अमेरिकी कचरा (F-16 जैसे पुराने प्लेटफॉर्म) खरीदे. लेकिन आज राफेल अपनी मारक क्षमता और ‘कॉम्बैट प्रूवन’ तकनीक के साथ दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विमानों में गिना जा रहा है, जबकि अमेरिका के F-35 जैसा विमान भी तकनीकी खामियों और युद्ध क्षेत्र में असुरक्षा के कारण सवालों के घेरे में है.
अमेरिका के लिए आत्ममंथन का वक्त
ईरान ने युद्ध के मैदान में तकनीक का जो संतुलन बदला है उसने अमेरिका के सैन्य गुरूर को मिट्टी में मिला दिया है. यह इस बात का संकेत है कि अब युद्ध केवल महंगे विज्ञापनों और मार्केटिंग से नहीं बल्कि जमीनी हकीकत और सटीक काउंटर-टेक्नोलॉजी से जीते जाते हैं. भारत का राफेल के साथ खड़ा रहना और अमेरिकी दबाव में न आना रक्षा क्षेत्र में एक स्वतंत्र और सशक्त राष्ट्र की पहचान बनकर उभरा है. अमेरिका के लिए यह समय आत्ममंथन का है कि आखिर क्यों उसके कथित बेस्ट हथियार आज सबसे ज्यादा लाचार नजर आ रहे हैं.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें





