India Strait of Hormuz Plan: होर्मुज में उतर चुके भारत के ‘पांडव’, कर रहे जहाजों की रखवाली, कैसे करा रहे संकट वाला रास्ता पार

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नई दिल्ली: अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग में सबसे ज्यादा चर्चा होर्मुज स्ट्रेट की हो रही है. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया का लगभग 20% से 25% कच्चा तेल और ईंधन (LNG) हर दिन गुजरता है. जंग के बीच ईरान ने अपने दुश्मन देशों के जहाज के लिए होर्मुज स्ट्रेट में नो एंट्री की बोर्ड लगा दी है. यहां तक कि पाकिस्तान को भी होर्मुज स्ट्रेट पर मुंह की खानी पड़ी है और कई जहाजों को मुहाने पर ही रोक दिया गया. ऐसे हालात में सवाल उठता है कि क्या वैश्विक सप्लाई चेन थम जाएगी? क्या भारत तक तेल पहुंचना मुश्किल हो जाएगा? लेकिन इसी संकट के बीच भारत ने चुपचाप एक ऐसी रणनीति लागू की है जिसे समझना बेहद जरूरी है. इंडियान नेवी ने अपने पांच जहाज को समंदर में उतार दिया है. यह जहाज भारतीय जहाजों की रखवाली के लिए उतारा गया है. यही वजह है कि भारतीय नौसेना के इन जहाजों को ‘पांडव’ कहा जा रहा है, जो बिना शोर के सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं.

CNN-News18 की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने ‘ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा’ के तहत पांच से ज्यादा युद्धपोत तैनात कर दिए हैं, जो सीधे जंग में कूदे बिना अपने जहाजों को सुरक्षित निकालने का काम कर रहे हैं. यह सिर्फ एस्कॉर्ट मिशन नहीं है, बल्कि एक मल्टी-लेयर सुरक्षा कवच है. जहां रणनीति, तकनीक और कूटनीति तीनों साथ चल रहे हैं. यही वजह है कि जंग के बीच होर्मुज स्ट्रेट को भारतीय जहाज पार कर पा रहे हैं.
पहले यह सफर सामान्य था, लेकिन अब ईरान जंग के बीच हर कदम पर खतरा है. (PTI)

क्यों बना यह प्लान?

सबसे पहले समझिए कि यह ऑपरेशन काम कैसे करता है. भारत के लिए कच्चा तेल और गैस लेकर आने वाले जहाज सऊदी अरब के रास तनुरा जैसे बंदरगाहों से निकलते हैं और फारस की खाड़ी होते हुए होर्मुज स्ट्रेट तक पहुंचते हैं. पहले यह सफर सामान्य था, लेकिन अब ईरान जंग के बीच हर कदम पर खतरा है. ऐसे में भारतीय नौसेना जहाजों को पहले से गाइड करती है कि कौन सा रास्ता सुरक्षित रहेगा और कब आगे बढ़ना सही होगा.

भारतीय नौसेना जहाजों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित कर रही है?

भारतीय नौसेना सीधे होर्मुज स्ट्रेट के अंदर तैनात नहीं है, लेकिन जैसे ही जहाज इस खतरनाक क्षेत्र को पार करते हैं, ओमान की खाड़ी में भारतीय युद्धपोत उन्हें एस्कॉर्ट करते हैं. इसके अलावा पूरे सफर के दौरान नौसेना जहाजों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखती है और उन्हें रीयल टाइम इनपुट देती है, जिससे वे किसी भी खतरे से बच सकें.

क्या सिर्फ एस्कॉर्ट ही इस ऑपरेशन का हिस्सा है?

नहीं, यह ऑपरेशन सिर्फ एस्कॉर्ट तक सीमित नहीं है. इसमें बैकचैनल कूटनीति भी शामिल है, जहां भारत क्षेत्रीय देशों से बातचीत कर जहाजों के सुरक्षित गुजरने का रास्ता तैयार करता है. साथ ही तकनीकी मदद जैसे हाइड्रोग्राफिक चार्ट के जरिए समुद्र के अंदर छिपे खतरों से भी जहाजों को बचाया जाता है.

होर्मुज में सबसे बड़ा खतरा क्या है?

सबसे बड़ा खतरा सिर्फ युद्धपोत या मिसाइल नहीं हैं, बल्कि समुद्र के अंदर बिछाई गई माइंस भी हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक ये माइंस जहाजों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं. ऐसे में सही नेविगेशन और रूट प्लानिंग बेहद जरूरी हो जाती है जो भारतीय नौसेना मुहैया करा रही है.

क्या कोई जहाज सुरक्षित निकल चुका है?

हां, ‘पाइन गैस’ और ‘जग वसंत’ जैसे LPG टैंकर भारतीय नौसेना की सुरक्षा में सुरक्षित निकल चुके हैं. ये करीब 92,000 टन गैस लेकर भारत की ओर बढ़ रहे हैं जो इस मिशन की सफलता का बड़ा उदाहरण है.

क्या अभी भी जहाज फंसे हुए हैं?

करीब 20 भारतीय जहाज अभी भी इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं. उनकी आवाजाही हालात के हिसाब से तय की जा रही है. इंडियन नेवी लगातार उनकी निगरानी कर रही है और जरूरत पड़ने पर खाने-पीने जैसी मदद भी पहुंचा रही है.

पूरे सफर के दौरान नौसेना जहाजों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखती है. (PTI)

समुद्र के अंदर छिपा खतरा और टेक्नोलॉजी की भूमिका

होर्मुज का संकट सिर्फ सतह पर दिखने वाला नहीं है. असली खतरा समुद्र के नीचे छिपा है. ऐसे में हाइड्रोग्राफिक चार्ट बेहद अहम हो जाते हैं. ये चार्ट समुद्र की गहराई, चट्टानों और माइंस जैसी चीजों की जानकारी देते हैं. भारत के पास इस क्षेत्र के बेहद सटीक चार्ट हैं जो उसे रणनीतिक बढ़त देते हैं.

  • भारतीय नौसेना की यह रणनीति दिखाती है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं जीते जाते बल्कि जानकारी और योजना भी उतनी ही अहम होती है. बिना सीधे टकराव के भारत अपने जहाजों को सुरक्षित निकाल रहा है, जो उसकी कूटनीतिक और सैन्य ताकत का संकेत है.
  • इस पूरे ऑपरेशन में एक और अहम पहलू है मानवीय सहायता. जो जहाज फंसे हुए हैं, उन्हें भारतीय युद्धपोतों से खाना और जरूरी सामान भी दिया जा रहा है. यानी यह मिशन सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की जिम्मेदारी और अपने लोगों के प्रति प्रतिबद्धता को भी दिखाता है.



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